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दुकानदारी (लघुकथा ) जानकी बिष्ट वाही

" रॉय जी ! मुझे नायर जी ने बताया कि आप भी शिक्षा के क्षेत्र में बिजनेस करना चाहते हैं।"
 " जी हाँ, आप से इसी बारे में बात करनी है।आप दो- दो इंजिनियरिंग कॉलेज और एक मेडिकल कॉलेज चला रहे हैं।आपको काफी अनुभव होगा।"
 " रॉय जी ! इंजीनियरिंग कॉलेज खोलना अब घाटे का सौदा है।मेरे ही दोनों कॉलेज में इस साल दो हज़ार सीटें खाली हैं ।समझ नहीं आ रहा लोगों को अब क्या हो गया।पहले तो हर माँ -बाप अपने बेटे को इंजीनियर बनाना चाहते थे। " गुप्ता जी ने दीवार पर लगे गांधी जी की तस्वीर पर एक नज़र डालते हुए कहा।
 " ओह... तो मेडिकल कॉलेज कैसा रहेगा ?"
 " देखिये रॉय जी ! मेडिकल कॉलेज खोलना बहुत महंगा है। हाँ अगर खोल लिया तो चाँदी क्या सोना काटेंगें।"
 " अब ज्यादा न सोचिये रॉय साहब! शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण ने तो हम लोगों के दोनों हाथों में लड्डू थमा दिए हैं ।हम बिजनेसमैन हैं।अगर हम ये मानवता और नैतिकता के बारे में सोचेंगे तो खायेंगें क्या ? " एक आँख दबाते हुए नायर जी ने कहा।और ये सुनते ही एक समवेत ठहाका कमरे में गूँज उठा।
 " अरे कुछ टूटा क्या ? कुछ चटकने की आवाज़ आई।" नायर जी ने इधर-उधर देखते हुए कहा।
 " नहीं कुछ भी तो नहीं ।"गुप्ता जी बोले।
 किसी की नज़र गाँधी जी की तस्वीर के चटके हुए शीशे पर नहीं पड़ी।


मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by Janki wahie on February 12, 2016 at 4:51pm
सादर आभार आ.रवि सर जी ।कथा पर समीक्षात्मक टिप्पणी कर मार्ग दर्शन करने हेतु। आपकी बात सिर आँखों पर ।नमन
Comment by Ravi Prabhakar on February 11, 2016 at 7:17pm

आदरणीय जानकी जी, /हम बिजनेसमैन हैं।अगर हम ये मानवता और नैतिकता के बारे में सोचेंगे तो खायेंगें क्या ?/  कथा को ये पंक्‍ित बहुत कमजोर बना रही है। वार्तालाप से जाहिर हो रहा है कि दोनो महानुभाव अपने व्‍यक्‍ितगत लाभ के विषय में ही बात कर रहे हैं और उन्‍हे मानवता अथवा नैतिकता से कुछ लेना देना नहीं है।  कथा में गांधी जी की तस्‍वीर के शीशे का चटकना भी कथा में संश्‍िलष्‍टता ला रहा है। इस कमजोर कथा पर कुछ और परिश्रम करने की आवश्‍यकता थी । सादर

Comment by Samar kabeer on February 11, 2016 at 5:51pm
मोहतरमा जानकी जी आदाब,इस प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें !
Comment by Nita Kasar on February 11, 2016 at 12:58pm
शिक्षा का क्षेत्र कमाऊ बिज़नेस हो गया है आजकल ।नैतिकता की परवाह इन्है कहाँ है।सारथक कथा के लिये बधाई ।आद०जानकी वाही जी ।
Comment by Amit Tripathi Azaad on February 11, 2016 at 11:02am

हार्दिक आभार आदरणीय  मिथलेश जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 11, 2016 at 1:39am

आदरणीया जानकी जी इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई.

Comment by Janki wahie on February 10, 2016 at 8:54pm
शुक्रिया प्रिय राहिला त्वरित सार्थक टिप्पणी कर हौसला अफ़जाई के लिए ।कथा पर आपकी उपस्थिति से कथा को चार चाँद लग जाते हैं।पुनः हार्दिक आभार।
Comment by Rahila on February 10, 2016 at 5:04pm
शानदार पंच...बहुत बढ़िया शिल्प से सजी।और नैतिकता के पतन को उजागर करती बेहतरीन रचना । बहुत बधाई प्रिय जानकी दी!सादर

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