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है जनता की समस्या का -( गजल )- लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

नेताई गजल

*************
1222 1222 1222 1222

********************
सदन में आप गर आओ वतन की बात मत करना
सहोदर  जैसे आपस में  गबन  की बात मत करना /1

उड़ाए  हमने  चुपके   से  लँगोटों  के  लिए सच है
शहीदों के हों नंगे तन कफन की बात मत करना /2

कभी  तुम  बोल  देते  हो  कभी  हम  बोल  देते हैं
चुनावी बात सबकी ही वचन की बात मत करना /3

दिखा  करते  हैं  फूलों सा मगर फितरत  है शूलों सी
गले आपस में मिलने पर चुभन की बात मत करना /4

हमें सावन के अंधे सा  हरा सब कुछ ही दिखता है
हमारे  सामने  कोई विजन  की  बात  मत करना /5

है जनता  की  समस्या  का  हमारे  पास  डंडा हल
अगर उठ जाए थोड़ा सा दमन की बात मत करना /6

कहा हमने अगर विकसित तो विकसित देश है लोगो
यहाँ  तुम  झोपड़ी या  फिर भवन की बात मत करना /7

मौलिक व अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 22, 2015 at 11:15am

आ० भाई मिथिलेश जी , सदा आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहता है .उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 22, 2015 at 11:13am

आ० भाई गोरखपुरी जी , प्रशंसा के लिए आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 22, 2015 at 11:12am

आ० भाई विजय जी ,आपकी उपस्थिति से ग़ज़ल का मान अत्यधिक बढ़ गया .स्नेह के लिए आभार l


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 17, 2015 at 12:03am

आदरणीय लक्ष्मण धामी सर जी बहुत शानदार ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद और मुबारकबाद कुबूल फरमाएं 

Comment by Samar kabeer on December 16, 2015 at 10:12pm
इन दो मिसरों में मुझे बयान साफ़ नहीं लगा,आप क्या कहना चाहते हैं,मैं नहीं समझ सका :-

1)"उड़ाए हमने चुपके से लँगोटों के लिए सच है"

2)"है जनता की समस्या का हमारे पास डंडा हल"
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on December 16, 2015 at 7:08pm
व्यवस्था पर तंज करती बेहतरीन गजल बहुत बहुत बधाई आ.
Comment by vijay nikore on December 16, 2015 at 1:50pm

 अच्छी गज़ल के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय लक्ष्मण जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 16, 2015 at 11:13am

आ० भाई जयनित जी स्नेह aur  प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 16, 2015 at 11:08am

आ० भाई मिथिलेश जी ग़ज़ल पर उपस्थिति से मन बढ़ने के लिए हार्दिक आभार .लमियों से अवगत करते रहें जिससे लेखन में सुधर किया जा सके . स्नेह के लिए पुनः आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 16, 2015 at 11:06am

आ० भाई समर कबीर जी , ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद .अनुरोध है कि जिन मिसरों का बयां साफ़ नहीं हो प् रहा उन को उद्धृत करे .जिससे सनक समाधान हो सके . सानुरोध धन्यवाद .

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