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अतुकांत - नीम तले ही खेलें ( गिरिराज भंडारी )

नीम तले ही खेलें

*****************

कहाँ छाया खोजते हो तुम भी

बबूलों के जंगलों में

केवल कांटे ही बिछे होंगे ,

नुकीले , धारदार

सारी ज़मीन में

काट डालें
जला ड़ालें उसे

 

उनके पास है भी क्या देने के लिये

सिवाय कांटों के

चुभन और दर्द के

कुछ अनचाही परेशानियों के

 

होंगी कुछ खासियतें ,

बबूलों में भी

पर इतनी भी नहीं कि लगायें जायें
बबूलों के जंगल

नीम में उससे भी जियादा हैं फायदे
सभी जानते हैं
कुछ अक़्ल के अंधों को छोड़ कर

यही तो है  

जो रात में भी जीवन दायनी आक्सीजन ही छोड़ते हैं

और वो भी बिना कांटों के ख़तरे के

लगाइये जितने चाहे बाग़ , जंगल, नीम के

अनुभव हीन बच्चों को समझाइये

बबूल के धोखे और नीम की ख़ासियत के बारे में
कहिये उनसे , अधिकार से
जब भी खेलें , जहाँ भी खेलें
नीम तले ही खेलें

*****************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 8, 2015 at 11:30am

बहुत खूब आ0 भाई गिरिराज जी हार्दिक बधाई ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 7, 2015 at 8:03pm

नीम के महत्व को रेखांकित करती इस  कविता हेतु बधाई . सादर.

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 7, 2015 at 10:53am
नीलगगन के तले, नीम के तले ही खेलें हमारे बेकसूर नवयुग के सृजक । बहुत बढ़िया प्रेरक रचना के लिए हृदयतल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय गिरिराज भंडारी जी।

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