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अरे ये क्या किया आपने, वक्त ज़रूरत के लिए एक ज़मीन थी वो भी बेच दी कल को बेटी की शादी करनी है और रिटायरमेंट के बाद के लिए कुछ सोचा है । एक सहारा था वह भी चला गया ।
अरे भाग्यवान, बेटी के इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन के लिए ही तो बेचा है, और बुढ़ापे का सहारा ये ज़मीन जायजाद नहीं हमारे बच्चे हैं और उनकी तरबियत की जिम्मेदारी हमारी है । रही बात शादी की तो, न लड़की की शादी में दहेज़ देंगे, न लड़के की शादी में दहेज़ लेंगे
हिसाब बराबर है, न लेना एक न देना दो ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by नादिर ख़ान on January 1, 2016 at 5:45pm

आदरनीय सौरभ सर बहुमूल्य ज्ञान वर्धक टिप्पणी के लिए आभार, समयाभाव और चिंतन में कमि (विषय को गहराई से न सोचना ) की वजह से कथ्य में सुदृणता नहीं आ रही  है | आगे इस बात का ध्यान रखूँगा बहुत आभार आपका। ..... 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 17, 2015 at 12:42am

नादिर भाई, आपकी यह लघुकथा भावनात्मक तौर पर अच्छी है लेकिन कथ्य को और कसावट दी जानी चाहिए. ऐसे संवादों से पात्रों की बुद्धिमानी और उनकी जागरुकता तो झलकती है लेकिन कथात्मकता पीछे छूट जाती है. आप कथ्य और उसके प्रस्तुतीकरण में थोड़ी नाटकीयता समाविष्ट करें, जो कि कथाओं का अहम भाग हुआ करता है, तो यह लघुकथा अवश्य ही स्मरणीय होगी. यानी, लघुकथा प्रासंगिक हो उठेगी. 

विश्वास है मेरी टिप्पणी में आप समालोचना और सकारात्मकता देखेंगे.

शुभेच्छाएँ 

Comment by vijay nikore on December 16, 2015 at 3:15pm

अच्छी लघु कथा के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय नादिर खान जी।

Comment by Rahila on December 5, 2015 at 1:33pm
बहुत खूब आदरणीय नादिर खान साहब !कुछ ऐसा ही होते देखा है तो आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं । बहुत उम्दा सोच ,सार्थक लेखन । बहुत बधाई आपको । सादर ।
Comment by नादिर ख़ान on December 4, 2015 at 4:21pm

आदरणीय सुनील जी रचना पर आपकी सकारात्मक टिप्पणी से लेखन सार्थक  हुआ । 

Comment by Sushil Sarna on December 3, 2015 at 7:45pm

आदरणीय जी समाज को दहेज़ विरोधी सन्देश देती इस  सुंदर लघु कथा के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें। 

Comment by नादिर ख़ान on December 3, 2015 at 6:26pm

आदरणीय उस्मानी साहब आपको रचना पसंद आयी, रचना कर्म सफल हुआ  बहुत बहुत शुक्रिया आपका .... 

Comment by नादिर ख़ान on December 3, 2015 at 6:24pm

आदरणीय लक्ष्मण साहब  हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया|

स्नेह बनाये रखें |

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 3, 2015 at 12:59pm
"तरबियत अहम है" और "दहेज़ लेन-देन प्रथा त्याज्य है" - ये दो अहम संदेश वाहक बढ़िया प्रस्तुति के लिए तहे दिल बहुत बहुत मुबारकबाद आपको जनाब नादिर ख़ान साहब। आपने कहा कि यह आपकी दूसरी लघुकथा है, पर हमें लगा कि आप अभ्यस्त लघु कथाकार हैं। शुरू से अंत तक प्रवाह पूर्ण प्रस्तुति है आपकी जन-जागरूकता का संदेश देती हुई।
Comment by नादिर ख़ान on December 3, 2015 at 12:54pm

कृपया ज़मीन जायजाद को ज़मीन जायदाद  पढ़ें । 

कृपया ध्यान दे...

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