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पाठ गीता का सुनाने के लिए आया नहीं

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 2122 212
==================================
मैं समस्यायें गिनानें के लिए आया नहीं।
धर्म नैतिकता सिखानें के लिए आया नहीं।।

सो रहे हैं आत्मा को बेचकर इंसान जो।
मत डरें उनको जगानें के लिए आया नहीं।।

जानता हूँ कल्कि युग की मान मर्यादा भी है।
नीतिगत बातें बतानें के लिए आया नहीं।।

तुम मगन अपनी लगन में ही रहो ओ साथियों।
राह में कंटक बिछाने के लिए आया नहीं।।

आचरण की सीख दूं, मुझको भला क्या गर्ज है।
कर्म के फल से डराने के लिए आया नहीं।।

भार कुछ सर पे तुम्हारे भी है मुझको ज्ञात है।
धर्म के पथ पर ले जानें के लिए आया नहीं।।

किसलिए आखिर भला मैं दूं दुहाई सृष्टि की।
मैं प्रलय का भय दिखानें के लिए आया नहीं।।

घोर लिप्सा लोभ के वश में सभी हैं क्या हुआ।
आवरण भ्रम का मिटानें के लिए आया नहीं।।

कर्म करिये फल की चिंता आप मुझ पर छोड़िये।
पाठ गीता का सुनानें के लिए आया नहीं।।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 7, 2015 at 11:31pm
आदरणीय कान्ता रॉय मैम, आप लोगों की शुभकामनायें ही मेरा सम्बल हैं।

सादर अभिवादन
Comment by kanta roy on October 7, 2015 at 11:28pm
वाह !!!! बहुत खूब अंदाज़ हुई है इस गजल की भी । कलयुग की मान मर्यादा वाली बात तो लाजवाब हो गई है । हर अशआर बडे ही कटाक्ष लिए बडी ही सार्थक बन पडीं है । दिली दाद कबूल फरमाईये आदरणीय पंकज जी । ऐसे ही लिखते रहिये शानदार । सादर
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 6, 2015 at 11:27am
आदरणीय गिरिराज सर; सादर प्रणाम्।
ग़ज़ल की तारीफ के लिए शुक्रिया।।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 6, 2015 at 11:20am

आदरणीय पंकज भाई , क्या बेहतरीन गज़ल कही है , मज़ा आगया पढ के , दिली बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 5, 2015 at 11:30pm
आदरणीय समर कबीर सर आपकी दाद पाकर मन प्रसन्न हो गया। ये सब आप लोगों के सहयोग का ही प्रतिफल है।
धीरे धीरे सुधार के लिए प्रयासरत हूँ।।

सादर अभिवादन
Comment by Samar kabeer on October 5, 2015 at 11:27pm
जनाब पंकज कुमार जी,आदाब,आपकी ग़ज़ल का निखार देखकर प्रसन्नता हुई है,बहुत ख़ूब,वाह,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 5, 2015 at 10:54pm
सादर अभिवादन सतविंदर जी।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 5, 2015 at 10:52pm
सुंदर।बधाई
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 5, 2015 at 10:52pm
आदरणीय सुशील सरन सर
सादर अभिवादन


ग़ज़ल को आपने शुभकामनाओं के अमृत से सिंचित किया; इसके लिए हार्दिक अभिवादन और सादर धन्वाद स्वीकारें
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 5, 2015 at 10:50pm
आदरणीय जान गोरखपुरी जी
ग़ज़ल आप तक पहुंची, मुझे अच्छा लगा।
आपको सादर धन्यवाद और अभिवादन

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