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प्रीत की रीत में प्रणय शामिल। मन्त्र अर्पण के बोलिये आख़िर।।

फ़ा’इ’ला’तुन म’फ़ा’इ’लुन फ़ा’लुन।
फ़ा’इ’ला’तुन म’फ़ा’इ’लुन फ़ा’लुन।।
========================================
( 2122 / 1212 / 22)
(रूबरू आ/प हो लिये/ आख़िर।
ख़ूबरू अक् /श खोलिये/ आख़िर।।)
=======================================
रूबरू आप हो लिये आख़िर।
ख़ूबरू अक्श खोलिये आख़िर।।

रूह से जो मिलन की है ख़ाहिश
आये हैं शर्म क्यों लिये आख़िर।।

आपके सुर सुनूँ तो मैं झूमूँ।
कूक कानों में घोलिये आख़िर।।

तन जो हिरणी सा आपका चञ्चल।
तान पर मेरी डोलिये आख़िर।।

हो पता भाव इस हृदय का भी।
दिल की धड़कन को तोलिये आख़िर।।

प्रीत की रीत में प्रणय शामिल।
मन्त्र अर्पण के बोलिये आख़िर।।


मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 3, 2015 at 1:48pm
जी सर; आपके सुझाव काबिले गौर हैं; कोशिश होगी कि उसे भी सुधर लूँ। दरअसल सारा ध्यान अभी काफ़ियः पर है।।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 3, 2015 at 1:20pm

आदरणीय ग़ज़ल  अच्छी कही है , दिली बधाइयाँ आपको । आपका रदीफ आखिर , सही अश आर मे मुझे सार्थक नही लग रहा है , कहीं कहीं आखिर शब्द निरर्थक जुड़ा भी लग रहा है , एक बार और सोचियेगा । मै गलत भी हो सकता हूँ ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 3, 2015 at 10:25am
सादर अभिवादन आदरणीय मनन सिंह सर
Comment by Manan Kumar singh on October 3, 2015 at 10:09am
'मन्त्र अर्पण के बोलिये आखिर' बढ़िया अभिव्यक्ति

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