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मैं आज अपने दिल के ज़ज़्बात भर कहूँगा

फ़ाइलातुन मफ़ऊल फ़ाइलातुन
2212 122 2212 122

मैं आज अपने दिल के ज़ज़्बात भर कहूँगा।
तुम पास आज बैठो मैं बात भर कहूँगा।

तुम मुस्कुराके सुनना, मुझे गुनगुनानें देना।
ग़ज़लों में इस हृदय के हालात भर कहूँगा।

ज़ुल्फ़ों के बादलों से ये चाँद झाँकने दो।
तुम चाँदनी बिखेरो मैं रात भर कहूँगा।।

छलका रही हो मदिरा,मयकदे नज़र से।
मधु रस की सिर्फ इसको बरसात भर कहूँगा।।

बेसुध हुआ हूँ ऐसे जैसे कोई शराबी।
मदिरा ए हुश्न की मैं सौगात भर कहूँगा।।


मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 15, 2015 at 3:46pm
जी आगे से ध्यान दिया जायेगा

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 15, 2015 at 2:46pm

आदरणीय पंकज जी, इस मंच पर आपसी संबोधनों में 'गुरु' संबोधन वर्जित है. सादर 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 15, 2015 at 2:08pm
सादर प्रणाम् मिथिलेश सर;ये सब आप गुरुजनों की देन है

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 15, 2015 at 1:19pm

आदरणीय पंकज जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 3, 2015 at 1:05pm
सादर प्रणाम् आदरणीय गिरिराज सर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 3, 2015 at 1:03pm

आ. पंकज भाई , अच्छी गज़ल हुई है , हार्दिक बधाई आपको !

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 1, 2015 at 4:58pm
सादर अभिवादन सुशील सर।
Comment by Sushil Sarna on October 1, 2015 at 4:52pm

मैं आज अपने दिल के ज़ज़्बात भर कहूँगा।
तुम पास आज बैठो मैं बात भर कहूँगा।

वाह रेशमी अहसासों से लबरेज़ वाली इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 30, 2015 at 6:43pm
वो छूट गया संशोधन;निम्नवत् पढ़ें---

छलका रही हो मदिरा,मयखाना ए नज़र से।
मधु रस की सिर्फ इसको बरसात भर कहूँगा।।
Comment by जयनित कुमार मेहता on September 30, 2015 at 6:39pm
चौथे शेर का पहला मिसरा..?

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