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गोलियों के बाद

खौफ् कॆ बारुद्
फिज़ा मॆं उड गयॆ
नक़ाब् के चह्ररॆ
श्हर् मॆं मिल् गयॆ
गॊलियॊ कि अवाज़्
कुछ् ऐसॆ बिखर् गयी
दॆखते ही देखते धर्रती
कि सुरत् बदल् गयी
कि कॊइ रॊता भी नही
कॊइ मुस्कुरता भी नही
कॊइ सॊता भी नही
कॊइ जागता भी नही
कॊइ चलता भी नहीं
कॊइ रुक्तता भी नही
कॊइ हारता भी नही
कॊइ हराता भी नही
कॊइ सहमता भी नही
कॊइ शर्रमाता भी नही
कॊइ खॊता भी नही
कॊइ पाता भी नही
कॊई आता भी नही
कॊई जाता भी नही
मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by S.S Dipu on July 31, 2015 at 12:48am
Comment by Deepu mundrawal just now
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Samar ji आपका सुझाव अनमोल है।आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
मैं बताना चाहती हूँ कि मैंने जबसे लिखना का प्रयास किया उन्हीं रचनाओं को पहले पोस्ट करना चाहती हूँ। जी मैं आइन्दा से हिंदी का प्रयोग करूँगी
धन्यवाद
Comment by Samar kabeer on July 30, 2015 at 11:51pm
your thinking is nice,but my sujjetion is please join obo ghazal classes,please post your comments in hindi .
Comment by S.S Dipu on July 29, 2015 at 10:02pm
thanks a lot for your suggestion and guidance.i appreciate it sir.respected मिथिलेश वामनकर ji all that I am posting is from the diary which was written with tender fingers . I didn't make any changes in that. I will post something very new very soon. Again thanks sir
Comment by S.S Dipu on July 29, 2015 at 9:55pm
Thanks a lot Sushil sarna ji. I am here to learn so much from you all.
Comment by Sushil Sarna on July 29, 2015 at 8:50pm

आदरणीया  , भाव सुंदर हैं लेकिन क्षमा सहित भाषा में त्रुटियाँ प्रवाह में बाधक हैं   … आदरणीय मिथिलेश जी की टिप्पणी पर मैं सहमत हूँ। प्रस्तुति पर बधाई। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 29, 2015 at 8:26pm

इस प्रस्तुति पर बधाई... वर्तनी दोष पर आपका  ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ .... साथ ही निवेदन है कि ओबीओ पर प्रस्तुत रचनाओं को एक बार पढ़ जाइए ... सादर 

Comment by maharshi tripathi on July 29, 2015 at 6:52pm

अच्छी  रचना पर बधाई आ. Deepu mundrawal जी |

कृपया ध्यान दे...

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