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“अरे बाबा ! आप किधर जा रहे है ?,” जोर से चींखते हुए बच्चे ने बाबा को खींच लिया.

बाबा खुद को सम्हाल नहीं पाए. जमीन पर गिर गए. बोले ,” बेटा ! आखिर इस अंधे को गिरा दिया.”

“नहीं बाबा, ऐसा मत बोलिए ,”बच्चे ने बाबा को हाथ पकड़ कर उठाया ,” मगर , आप उधर क्या लेने जा रहे थे ?”

“मुझे मेरे बेटे ने बताया था, उधर खुदा का घर है. आप उधर इबादत करने चले जाइए .”

“बाबा ! आप को दिखाई नहीं देता है. उधर खुदा का घर नहीं, गहरी खाई है .”

 ----------------------------------

११/०७/२०१५ 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by Omprakash Kshatriya on July 14, 2015 at 7:52am

आदरणीया  kanta roy  जी 

आप को लघुकथा पसंद आई. आप ने इस के मर्म को खूबसूरती से प्रस्तुत किया. इस के लिए आप का ह्रदय से आभारी हूँ.

Comment by kanta roy on July 13, 2015 at 8:44pm
संस्कार के तरफ खींचती हुई ..... बच्चे की संवेदनशीलता और तिरस्कृत बुढापा .... तीनों का संयोजन क्या खूब हुआ है यहाँ । बहुत ही बढिया कथा हुई है आपकी आदरणीय ओमप्रकाश क्षत्रिय जी । बधाई
Comment by Omprakash Kshatriya on July 13, 2015 at 9:15am

आदरणीय Madanlal Shrimali जी 

आप की टिपण्णी पढ़ कर मन खुश हो गया. आप को लघुकथा अच्छी लगी .//कहते है बुढ़ापे में औलाद ही माँ बाप की आँखे होती है// और जब आंखे साथ छोड़ जाए तो आदमी बेसहारा हो जाता है.

शुक्रिया आप का 

Comment by Omprakash Kshatriya on July 13, 2015 at 9:13am

आदरणीय vinaya kumar singh  जी आप ने लघुकथा की सार्थकता पर सार्थक बात कही है . आप ने इसे एक सफल लघुकथा माना है. यह मेरे लिए बहुत ख़ुशी की बात है. एक लघुकथाकार की लघुकथा सफल हो जाए, इस से बड़ी ख़ुशी उस के लिए और क्या हो सकती है. आप का आभार .

Comment by Omprakash Kshatriya on July 13, 2015 at 9:09am

आदरणीय  PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA जी 

सादर प्रणाम.

आप ने शानदार बात कही -//आप को दिखाई नहीं देता है.// के बगैर कम नही चल सकता था क्या  ?//

जी हां. मगर मेरा ध्यान ही नहीं गया. आप ने यह कमी बताई . आभारी हूँ. इस को हटाने से लघुकथा में और कसावट आ जाएगी श्रीमान.

आभार आप का 

Comment by Omprakash Kshatriya on July 13, 2015 at 9:06am

आदरणीय  धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी 

आप को लघुकथा पसंद आई . मेरी मेहनत सफल हो गई .

आभार आप का 

Comment by Madanlal Shrimali on July 13, 2015 at 8:05am
कहते है बुढ़ापे में औलाद ही माँ बाप की आँखे होती है मगर कलयुगी औलाद ही पिता को मारने पे तुली है। इस सुन्दर मार्मिक लघुकथा के लिए बधाई स्वीकार करे आ.ओमप्रकाशजी।
Comment by विनय कुमार on July 13, 2015 at 2:16am

बुढ़ापे में तो औलाद आजकल ख़ुदा के घर ही भेजने की जल्दी में रहती है वालिदैन को , बहुत बेहतरीन लघुकथा । इतने कम शब्दों में आपने अपना सन्देश स्पष्ट कर दिया , यही इसकी सफलता है । बहुत बहुत बधाई आदरणीय ओम प्रकाश जी ..

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 12, 2015 at 6:40pm

//आखिर इस अंधे को गिरा दिया.//--ठीक  है 

फिर आदरणीय जी 

//आप को दिखाई नहीं देता है.// के बगैर कम नही चल सकता था क्या  ?

बढ़िया कथा , कलियुगी पुत्र की कहानी , बधाई सादर 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 12, 2015 at 6:26pm

अच्छी लघुकथा है आदरणीय ओमप्रकाश जी, दाद कुबूल कीजिए

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