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सलीक़ा सड़क का (लघुकथा)

पुलिस के सिपाही अकसर चौराहे से नदारद रहते, । सरकारी ड्यूटी बीच में छोड़ किसी अपने निजी काम से निकल जाते।  किन्तु उनके जाते ही एक वृद्ध हाथ में तख्ती लिये वहां खड़ा हो जाता, जिस पर लिखा होता:
"जिंंदगी ज़्यादा ज़रूरी है, जल्दबाज़ी न करें'
कुछ लोग रूक कर पूछ लेते

'बरसों से देख रहे है बाबा, क्यों इतनी परेशानी उठाते हो ? इस काम के लिए पुलिस है न यहाँ।"

"हाँ बेटा, पर पुलिस क्या जाने दर्द क्या होता है।"

"उनको तो सरकार तनख्वाह देती है, तुम सारा दिन क्यों खपते रहते हो ?"

"बेटा, जैसे ही लोग यह तख्ती देखते है, गाड़ी धीमी गति से चलना शुरू कर देते है। जैसे माँ के शब्द उनके कानो में गूंजने लगते हों :कि "बेटा समय से घर आ जाना।"
यह कहते हुए उसकी आँखें बरबस बरस पड़ी ।
"मैंने अपना जवान बेटा, अपने बुढ़ापे की लाठी गँवायी है सड़क हादसे में ।"

मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 17, 2015 at 12:49am

आदरणीया नीताजी, इस रचना प्रयास पर हार्दिक बधाइयाँ स्वीकारें.
सादर

Comment by TEJ VEER SINGH on July 10, 2015 at 6:13pm

आदरणीय नीता जी , आपका विषय बेहद संज़ीदा है!मैने कुछ समय पूर्व एक समाचार पत्र में ऐसी ही एक खबर पढी थी कि एक महिला अपने इकलौते बेटे को सडक दुर्घटना में गंवा बैठी थी!अब वह महिला अपनी सेवायें ट्रैफ़िक  कंट्रोल के लिये स्वेच्छा से बिना किसी आर्थिक लाभ के दे रही है!बेहतरीन रचना !बधाई!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 10, 2015 at 9:34am

अगहु कथा तो बढ़िया है पर क्या सचमुच ऐसा कोई पागल  (संवेदनशील) बुद्ध  वास्तव में मिल सकता है . कहानी आदर्श तो है पर यथार्थ से दूर लगती है . , सादर .

Comment by kanta roy on July 8, 2015 at 4:10pm
सार्थक संदेश के साथ एक सुंदर लघुकथा बनी है । बहुत ही बढिया

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 8, 2015 at 2:04pm

कथा अपने मर्म को अभिव्यक्त करने में सफल 

हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति पर 

Comment by Omprakash Kshatriya on July 8, 2015 at 7:17am

आदरणीय  नीता कसार जी , आप की लघुकथा में जान है. क्यों न हो, आप की कथा पर आप ने भरपूर मेहनत की है. इस बढ़िया लघुकथा की मेरी और से बधाई .

Comment by Nita Kasar on July 7, 2015 at 8:12pm
गंतव्य तक पहुँचने की इतनी शीघ्रता रहती है की हम भूल जाते है कि जीवन दोबारा नहीं मिलताा ।
कथा पर राय व्यक्त करने के लिये सादर शुक्रिया आद० विनय सिंह जी एवं आदरणीय मोहन सेठी जी
Comment by विनय कुमार on July 7, 2015 at 6:08pm

बहुत मार्मिक लघुकथा , दर्द तो वही समझ सकता है , जिसने खोया हो किसी को | बधाई ..

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on July 7, 2015 at 4:57pm

आदरणीया Nita Kasar जी बिलकुल सत्य है ज़रा सी लापरवाही कितना अनर्थ कर सकती है ....सार्थक लघुकथा के लिये बधाई 

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