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लघुकथा- आग

बरसते पानी में काम को तलाशती हरिया की पत्नी गोरी को बंगले में कुत्ते को बिस्कुट खाते हुए देख कर कुछ आश जगी, ‘ यहाँ काम मिल सकता है या खाने को कुछ. इस से दो दिन से भूखे पति-पत्नी की पेट की आग बुझ  सकती थी.’

“ क्या चाहिए ?”

“ मालिक , कोई काम हो बताइए ?”

“ अच्छा ! कुछ भी करेगी ?” संगमरमरी गठीले बदन पर फिसलती हुई चंचल निगाहें उस के शरीर के रोमरोम को चीर रही थी.

“ जी !! ” वह धम्म से बैठ गई. उसे आज महसूस हुआ कि बिना तन की आग बुझाए पेट की आग नहीं बुझ सकती है उसे पेट की आग बुझाने के लिए तन की आग में जलने होगा .  

------------------------------

मौलिक व अप्रकाशित 

२८/०९/२०१५ 

Views: 671

Comment

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 2, 2015 at 7:17pm

आज की सच्चाई से पर्दा उठाती कथा मिथिलेश जी के सुझावों पर अमल करें! सादर!

Comment by maharshi tripathi on July 2, 2015 at 5:10pm

आज की वर्तमान परिस्थिति में ,,सायद ही कोई हो जो इस बात से अनभिज्ञ हो ,,,,बहरहाल आपकी ;लेखनी को  लघुकथा पर बधाई |

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 2, 2015 at 2:37pm

सुन्दर कथा हार्दिक बधाई! आ० ओमप्रकाश जी! गरीब पेट की आग में हर तरह से जलता ही आ रहा है!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 2, 2015 at 2:26pm

यह मानव सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदी है ..सम्बेदन शील बिषय पर लिखी इस रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 1, 2015 at 2:36pm

बढ़िया लघुकथा प्रस्तुति 

बूझ  - बुझ 

बूझाए - बुझाए

उसे पेट की आग बुझाने के लिए तन की आग में जलना होगा .

बूझो तो जाने ......

सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 29, 2015 at 8:17pm

बिना तन की आग बूझाए पेट की आग नहीं बूझ सकती----------सामाजिक यथार्थ का एक पहलू

Comment by Shyam Narain Verma on June 29, 2015 at 11:44am
बहुत ही बढि़या है लघुकथा आदरणीय, सादर
Comment by विनय कुमार on June 28, 2015 at 11:09pm

अच्छी लघुकथा आदरणीय , थोड़ा त्रुटियों का ध्यान रखिये , खटकती हैं । बधाई इस रचना के लिए.

कृपया ध्यान दे...

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