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ग़ज़ल : सवाल एक है लेकिन जवाब कितने हैं

बह्र : १२१२ ११२२ १२१२ २२

हर एक शक्ल पे देखो नकाब कितने हैं

सवाल एक है लेकिन जवाब कितने हैं

 

जले गर आग तो उसको सही दिशा भी मिले

गदर कई हैं मगर इंकिलाब कितने हैं

 

जो मेर्री रात को रोशन करे वही मेरा

जमीं पे यूँ तो रुचे माहताब कितने हैं

 

कुछ एक जुल्फ़ के पीछे कुछ एक आँखों के

तुम्हारे हुस्न से खाना ख़राब कितने हैं

 

किसी के प्यार की कीमत किसी की यारी की

न जाने आज भी बाकी हिसाब कितने हैं

-------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by मोहन बेगोवाल on June 28, 2015 at 1:41pm

 आदरणीय धर्मेन्द्र जी, सभी अश'आर कमाल के कहे - बधाई हो 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 28, 2015 at 12:26pm

आ०  धर्मेन्द्र जी

बहुत गजब लिखा . आपको बधाई .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 28, 2015 at 4:45am

शानदार 

लाजवाब 

बेमिसाल 

ग़ज़ल हुई है ...... वाह वाह 

शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं 

Comment by दिनेश कुमार on June 27, 2015 at 10:53pm
क्या बात है, बेहतरीन ग़ज़ल। वाह वाह
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 27, 2015 at 6:10pm

बहुत बहुत शुक्रिया वीनस जी

Comment by वीनस केसरी on June 27, 2015 at 3:34pm

वाह वा भाई बेमिसाल ग़ज़ल हुई है ... मज़ा आ गया

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 27, 2015 at 2:54pm
तह-द-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आदरणीय गिरिराज जी, स्नेह बना रहे।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 27, 2015 at 2:53pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया कान्ता जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 27, 2015 at 2:48pm
बहुत बहुत शुक्रिया भुवन साहब। मेरी को मिरी या मेरि भी पढ़ा जा सकता है।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 27, 2015 at 1:37pm

क्या ब्बात है , आदरणीय धर्मेंद्र भाई ,  बेमिसाल गज़ल कही है , हरेक शे र पर बस वाह वाह करता रहा  ! पूरी गज़ल के लिए दिल से बधाइयाँ आपको ॥

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