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ग़ज़ल - फिल बदीह -- बे ज़ुबाँ कह सके रास्ता भी नहीं ( गिरिराज भंडारी )

 २१२    २१२    २१२    २१२

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दोस्त निर्लिप्त है, टोकता भी नहीं

और पूछो अगर बोलता भी नहीं  

 

बोलना जब मना,  फाइदा भी नहीं

बे ज़ुबाँ कह सके रास्ता भी नहीं 

रात तारीकियों से घिरी इस क़दर

मंज़िलें बेपता , रास्ता भी नहीं

 

तुम अभी तो न घेरो अँधेरों मुझे

सब्र थोड़ा करो दिन ढला भी नही

 

अजनबी की तरह हम जिये जा रहे

मिल रहे रोज़ पर वास्ता भी नही

 

इक गज़ल कह दिया है मेरे दिल ने जो

खुश नुमा गर नहीं , मर्सिया भी नहीं

 

जब रहे पास तो , कोशिशें की मगर    

दिल खुला जो नहीं,  तो मिला भी नहीं

 

इक दिया बाल के आजमाओ न यूँ

आँधियाँ भी नहीं, है हवा भी नहीं

 

क़ायदा जिसपे हम ने यक़ीं था किया

दौड़ना छोड़िये वो चला भी नहीं

 

जो नज़र से गिरा तो गिरा इस क़दर

मैने खोजा नहीं ख़ुद मिला भी नहीं

***************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

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Comment

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Comment by Pari M Shlok on June 19, 2015 at 5:37pm
क़ायदा जिसपे हम ने यक़ीं था किया
दौड़ना छोड़िये वो चला भी नहीं // खूबसूरत अशआर ग़ज़ल के बधाई सर ..
Comment by Sushil Sarna on June 19, 2015 at 12:38pm

तुम अभी तो न घेरो अँधेरों मुझे
सब्र थोड़ा करो दिन ढला भी नही

बहुत सुंदर आदरणीय भंडारी जी ..... बहुत ही खूबसूरत अहसासों के अशआर आपने ग़ज़ल में पिरोये हैं। हार्दिक बधाई स्वीकार करें सर।

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 19, 2015 at 11:32am
अजनबी की तरह हम जिये जा रहे
मिल रहे रोज़ पर वास्ता भी नही। .
यह सही दुनियाँ दारी है , बधाई, आदरणीय गिरिराज भंडारी जी, सादर।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 19, 2015 at 10:47am

आ० अनुज

फिल बदीह , वह भी इतनी जबरदस्त .

क़ायदा जिसपे हम ने यक़ीं था किया

दौड़ना छोड़िये वो चला भी नहीं

 

जो नज़र से गिरा तो गिरा इस क़दर

मैने खोजा नहीं ख़ुद मिला भी नहीं

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