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ग़ज़ल - फिल बदीह -- बे ज़ुबाँ कह सके रास्ता भी नहीं ( गिरिराज भंडारी )

 २१२    २१२    २१२    २१२

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दोस्त निर्लिप्त है, टोकता भी नहीं

और पूछो अगर बोलता भी नहीं  

 

बोलना जब मना,  फाइदा भी नहीं

बे ज़ुबाँ कह सके रास्ता भी नहीं 

रात तारीकियों से घिरी इस क़दर

मंज़िलें बेपता , रास्ता भी नहीं

 

तुम अभी तो न घेरो अँधेरों मुझे

सब्र थोड़ा करो दिन ढला भी नही

 

अजनबी की तरह हम जिये जा रहे

मिल रहे रोज़ पर वास्ता भी नही

 

इक गज़ल कह दिया है मेरे दिल ने जो

खुश नुमा गर नहीं , मर्सिया भी नहीं

 

जब रहे पास तो , कोशिशें की मगर    

दिल खुला जो नहीं,  तो मिला भी नहीं

 

इक दिया बाल के आजमाओ न यूँ

आँधियाँ भी नहीं, है हवा भी नहीं

 

क़ायदा जिसपे हम ने यक़ीं था किया

दौड़ना छोड़िये वो चला भी नहीं

 

जो नज़र से गिरा तो गिरा इस क़दर

मैने खोजा नहीं ख़ुद मिला भी नहीं

***************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 22, 2015 at 12:46pm
आदरणीय गिरिराज जी, अच्छे अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल करें
Comment by Rahul Dangi Panchal on June 22, 2015 at 7:52am
समझाने हेतु शुक्रिया आदरणीय

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 22, 2015 at 6:48am

आदरनीय राहुल भाई , सरहना और सलाह के लिये आपका आभारी हूँ ।

हाल पूछे जो हम बोलता भी नहीं  ,     सलाह बहुत अच्छा है , भाव अलग है ,  मै पहले मिसरे में खुद को गलत करने से न टोकने की बात कर रहा  हूँ , तो द्दोद्सरे मिसरे में उसला हाल कैसे पूछँगा ,  मै ये कहना चाहता हूँ कि न तो वो खुद मुझे गलत करने से टोकता न ही मै पूछता हूँ कि क्या गलत है तो बताता ।

लना जब मना, फाइदा भी नहीं।    मिसरे मे   बो छूट गया है  इसे  कृपया पाठक यूम पढें  ---

बो लना जब मना, फाइदा भी नहीं।

इक दिया बाल के आजमाओ न यूँ

आँधियाँ भी नहीं, है हवा भी नहीं     ---   इस  शे र मे मै वही तो बोल रहा हूँ जो आप समझे  हैं ---- जहाँ आँधी और हवा दोनो नही है अर्थात जहाँ खतरा ही नहीं वहाँ खुद को क्यों आजमा रहें हैं ।   आजमाओ न यूँ   --- आप न को पढ़्ना भूल गये हैं शायद ॥

Comment by Rahul Dangi Panchal on June 21, 2015 at 8:53pm
आदरणीय गजल बहुत ही सुन्दर हुई है । मैं अपनी छोटी समझ से कुछ सुझाव की हिम्मत कर रहा हुँ अगर मैं गलत हूं तो क्रपया क्षमा कर देना और मार्ग दर्शन करना।

और पूछो अगर बोलता भी नहीं इस मिसरे को कुछ इस तरह देखे
हाल पूछे जो हम बोलता भी नहीं । सन्रम

लना जब मना, फाइदा भी नहीं। यह मिसरा बेबहर है शायद लना के ल से पहले कोई अक्षर आपसे छूट गया हो अगर नहीं तो इस मिसरे का क्रपया अर्थ समझाए। सादर।


इक दिया बाल के आजमाओ न यूँ
आँधियाँ भी नहीं, है हवा भी नहीं । आदरणीय इस शेर का अर्थ समझ नहीं पाया जब हवा और आँधी ही नहीं तो आजमाना कैसा क्रपया समझाए। सादर सन्रम।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 21, 2015 at 12:44pm

आदरणीया राजेश जी , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 21, 2015 at 10:08am

रात तारीकियों से घिरी इस क़दर

मंज़िलें बेपता , रास्ता भी नहीं

 बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखी है आ० गिरिराज जी बहुत बहुत बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 20, 2015 at 5:54pm

आदरणीय परि एम श्लोक भाई , हौसला अफज़ाई का दिली शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 20, 2015 at 5:53pm

आदरणीय सुशील सरना भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 20, 2015 at 5:53pm

आदरणीय विजय भाई , हौसला अफज़ाई का बेहद  शुक्रिया आपका ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 20, 2015 at 5:52pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , आपका बहुत बहुत आभार ,सराहना के लिये और दो शे र पसंद करने के लिये ।

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