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स्याह धब्बा

ढलते सूरज-से रिश्ते की बुझती लालिमा

सिकुड़ती सिमटती जा रही

अनकही बातों के अरमानों की

अप्राकृतिक अकुलाहट

अपने ही कानों में भयानक

दुर्घटना-सी

अमावस-सी अँधियारी कसकती रात

डरता है व्याकुल बेसुध मन

कि अब तुम नहीं हो पास

बहता है दुख

बेचैन बदनसीब रिश्ता ...

अब स्याह धब्बे-सा

--------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on June 13, 2015 at 11:37pm

आदरणीय गोपाल नारायन जी, मेरी भावनाओं को पूज्य जयशंकर प्रसाद जी के साथ नाम दे कर आपने मुझको बहुत मान दिया है... आँखें भीग गयी हैं। आपका हार्दिक आभार।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 13, 2015 at 11:11pm

न होना के बाद होने का अहसाह होना बहुत कष्टदायक होता है!सुन्दर रचना! हार्दिक बधाई आ० विजय निकोर ज़ी!

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 9, 2015 at 11:29pm

रिश्ते जो रह नहीं पाते ,
कैसे ढलते, धूमिल हो जाते,
रंगत उड़ जाती,नहीं फिर भी जाते,
इक धब्बे से रह जाते.
बहुत खूब, क्या खूब लिखा है आपने आदरणीय विजय निकोर जी , बधाई, सादर.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 9, 2015 at 12:40pm

आदरणीय निकोर जी

काश मैं  आपका दर्द बाँट पाता . आप जैसी पीड़ा जयशंकर प्रसाद की भी थी . वह् कहते  हैं -

रों रो कर सिसक सिसक कर कहता मैं करुण  कहानी

तुम   सुमन   नोचते   सुनते    करते   जानी   अनजानी   ---------------सुमन नोचना निष्ठुरता का प्रतीक . सादर .

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