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" तुमको बुरा नहीं लगता इसमें , बिना अपनी मर्ज़ी के ये सब ", उसने पूछ लिया |
" हाँ , बहुत तक़लीफ़ हुई थी मुझे , जब अस्मत लुटी थी मेरी | और उससे भी ज्यादा तक़लीफ़ तब हुई थी , जब घर वालों ने भी दरवाज़ा बंद कर दिया था "|
उसने अपना चेहरा घुमा लिया , पुराना दर्द फिर उभर आया था |

.
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on May 29, 2015 at 12:48pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय श्री सुनील जी..

Comment by shree suneel on May 29, 2015 at 10:39am
चंद पंक्तियों में दुखों के कई आवरण... आदरणीय विनय जी, सफल लघु-कथा के लिए बधाई आपको.
Comment by विनय कुमार on May 28, 2015 at 8:47pm

आपने सराहा , अब और क्या चाहिए आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी | बहुत बहुत आभार आपका ..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 28, 2015 at 8:23pm

कोई रचना मात्र इसलिए सफल नहीं हुआ करती कि उसमें प्रयुक्त शब्दों से चमत्कार पैदा होता है, बल्कि उसके शब्दों ने क्या नहीं कहा और वह सारा कुछ निस्सृत हो जाय. यही कुछ आपकी इस प्रस्तुति में संभव हुआ है. आपकी इस लघुकथा से निस्सृत हुए भाव इस समाज की असंवेदनशीलता को गहराई से साझा करते हैं.
हार्दिक बधाई स्वीकर करें, आदरणीय विनय कुमारजी.

Comment by विनय कुमार on May 28, 2015 at 6:12pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी , धन्यवाद इस टिप्पणी के लिए..

Comment by विनय कुमार on May 28, 2015 at 6:12pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय  जितेन्द्र पस्टारिया जी , धन्यवाद इस टिप्पणी के लिए..

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 28, 2015 at 12:15pm

वाऊ ....... बहुत बढ़िया . बधाई हो .

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 28, 2015 at 10:27am

बहुत ही कम शब्दों में , बड़ी गहन बात कही आपने आदरणीय विनय जी. हार्दिक बधाई स्वीकारें

Comment by विनय कुमार on May 28, 2015 at 10:24am

बहुत बहुत आभार आदरणीय मोहन सेठी इंतज़ार जी..

Comment by विनय कुमार on May 28, 2015 at 10:23am

बहुत बहुत आभार आदरणीय कृष्ण मोहन जान गोरखपुरी जी.

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