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रफ्ता रफ्ता जिंदगी की आरजू जाती रही ।
दरमियाँ तन्हाइयों के मौत कुछ गाती रही ।।

मत कहो वो बेवफा थी आसनाई में मिरे।
वो खयालो में मेरे यूँ रात भर आती रही।।


बारिशें मुमकिन कहाँ जो भीग जाते हम कभी ।
बनके सावन की घटा ता उम्र वो छाती रही ।।


रोज़ रुसवाई की चर्चा फ़िक्र का अपना शबाब।
मैं जलूँगी ख़ाक होने तक कसम खाती रही ।।


फिर समंदर ने गुजारिश की है लहरो से यहां।
साहिलों की तश्नगी पर जुल्म क्यों ढाती रही ।।


माँ यतीमों की तरह मजबूर हो करती बसर।
जो दुआएं मांग कर मेरे लिए लाती रही ।।

जिसकी आँखों में शरारत वो थी महबूबा मेरी ।
पर जो नज़र खामोश थी बीबी वही भाती रही ।।

--नवीन मणि त्रिपाठी

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Comment

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Comment by वीनस केसरी on May 31, 2015 at 12:01pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है
बधाई स्वीकारें

ग़ज़ल के आख़िरी मिसरे के प्रति सौरभ जी ने आपको सचेत कर ही दिया है ...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 28, 2015 at 11:31am

आदरणीय नवीन मणि जी, आपका इस मूल मंच पर हार्दिक स्वागत है. आपकी एक अच्छी ग़ज़ल सामने आयी है. दाद कुबूल करें. 

पर जो नज़र खामोश थी बीबी वही भाती रही  -- इस मिसरे को एक बारी फिर से देख लें..

शुभेच्छाएँ

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 27, 2015 at 12:39pm

बहुत सुन्दर गज़ल,हार्दिक बधाई!भाई नवीन जी!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 26, 2015 at 3:35pm

आदरणीय नवीन मणि जी, सभी अशआर अच्छे लगें, मिरे = मेरे ही लिखे, पढने वाले खुद समझ जायेंगे कि वहां मात्रा गिरायी गयी है, बधाई इस प्रस्तुति पर.

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 26, 2015 at 2:31pm

बहुत खूब ..
बधाई आपको 

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 26, 2015 at 12:14pm
भाई केवल प्रसाद जी आभार।
Comment by Naveen Mani Tripathi on May 26, 2015 at 12:11pm
आदरणीय गोपाल श्रीवास्तव सर आभार ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on May 26, 2015 at 12:09pm
आदरणीय मिथिलेश जी सादर आभार।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 26, 2015 at 12:49am

आदरणीय नवीन जी,बहुत ही ख़ूबसूरत और उम्दा ग़ज़ल से हुई है शेर दर शेर दाद के साथ दिली मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 25, 2015 at 9:35pm

आ0 नवीन भाईजी, सुंदर गज़ल के लिये हार्दिक बधाई स्वीकारे. सादर

कृपया ध्यान दे...

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