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मध्य अपने जम गयी क्यों बर्फ़.. गलनी चाहिये
कुछ सुनूँ मैं, कुछ सुनो तुम, बात चलनी चाहिये

खींचता है ये ज़माना यदि लकीरें हर तरफ  
फूल वाली क्यारियों में वो बदलनी चाहिये

ध्यान की अवधारणा है, ’वृत्तियों में संतुलन’
उस प्रखरतम मौन पल की सोच फलनी चाहिये !

हो सके तो बन्द सारी खिड़कियाँ हम खोल दें
अब शहर में ज़िन्दग़ी की साँस चलनी चाहिये

देश के उत्थान की चिंता करे सरकार ही ?
राष्ट्र-हित की आग तो हर दिल में’ जलनी चाहिये    

भेद मत्सर औ’ घृणा के रोक ले अवशिष्ट जो-
हाथ में हर नागरिक के एक छलनी चाहिये
************
-सौरभ
(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by वीनस केसरी on May 7, 2015 at 1:39am

बहुत खूब

शानदार ग़ज़ल हुई है ////


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 7, 2015 at 12:35am
आदरणीय सौरभ सर,
बेहतरीन तरही ग़ज़ल हुई है।
हिंदी के तत्सम शब्दों का जिस खूबसूरती से प्रयोग हुआ है हरेक शेर मुग्ध कर रहा है।
इस सुन्दर प्रेरणास्पद प्रस्तुति हेतु आभार। नमन।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 6, 2015 at 11:35pm

बहुत सुंदर गजल, सर. हर एक शे'र सादगीपूर्ण लगा. ह्रदय से बधाई स्वीकारें

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 6, 2015 at 10:52pm
यूं तो पूरी ग़ज़ल सुन्दर है, आकर्षित कर रही है, पर ये तो बड़ी गहरी बात हो गयी ,
ध्यान की अवधारणा है, ’वृत्तियों में संतुलन’
उस प्रखरतम मौन पल की सोच फलनी चाहिये !
वाह , " सोच फलनी चाहिए " बहुत बहुत बधाई , आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी , शुभकामनाएं, सादर।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 6, 2015 at 10:10pm

आदरणीय गिरिराजभाईजी, यह एक तरही ग़ज़ल है, वो भी तुरत में प्रस्तुत करना था. वस्तुतः यह ग़ज़ल दुष्यंत की अत्यंत प्रसिद्ध ग़ज़ल पर ही आधारित है.

आपको मेरे अश’आर पसंद आये यही मेरे लिए पुरस्कार है. सादर धन्यवाद ..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 6, 2015 at 10:06pm

भाई दिनेशजी, आपने इस प्रस्तुति को अनुमोदित कर मेरा मान किया है. हार्दिक धन्यवाद भाईजी.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 6, 2015 at 10:04pm

आदरणीय नीलेशजी, प्रस्तुति पर आपकी चटपट उपस्थिति के लिए हार्दिक धन्यवाद. आपकी प्रशंसा मेरे लिए वस्तुतः अर्थवान है.
सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 6, 2015 at 8:13pm

क्या बात है , आदरणीय सौरभ भाई , एक  एक शे र एक एक सूत्र हैं जीवन के । लाजवाब गज़ल हुई है । पढ़ के दुश्यंत जी और आ. एहतराम भाई दोनो की याद ताज़ा हो गई । किसी एक - दो को  चुन पाना बेहद मुश्किल काम है , पूरी गज़ल के लिये आपको हृदय से बधाइयाँ ॥  

Comment by दिनेश कुमार on May 6, 2015 at 8:01pm
वाह वाह आदरणीय, बहुत खूब। कमाल की सोच अशआर में परिवर्तित हुई है। ढेरों दाद व मुबारकबाद सर।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 6, 2015 at 7:24pm

बहुत खूब आदरणीय ..बड़े गहरे शेर हुए हैं..हर शेर पर बधाई और दाद हाज़िर है 

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