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आँखों में बेबस मोती है …

आँखों में बेबस मोती है …

रात बहुत लम्बी है

ज़िंदगी बहुत छोटी है
पत्थरों के बिछोने पे
लोरियों की रोटी है
अब वास्ता ही नहीं
हाथों की लकीरों से
भूख बिलखती है पेट में
मुफलिसी साथ सोती है
आते ही मौसम चुनाव का
होठों पे हँसी होती है
राजनीति की जीत हमेशा
हम जैसों से ही होती है
हर चुनाव के भाषण में
नाम हमारा ही होता है
कुर्सी मिलते ही फिर से
फुटपाथ पे तकदीर होती है
संग होते हैं श्वान वही
वही भूखी रात होती है
रूठी हुई ज़िंदगी का 
आँखों में बेबस मोती है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on May 7, 2015 at 7:55pm

आदरणीय  Dr Ashutosh Mishra जी रचना  पर आपकी स्नेहिल ऊर्जावान प्रशंसा का तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 6, 2015 at 2:49pm

आदरणीय सुशील जी ..वर्तमान परिदृश्य में जो कुछ हो रहा है उसका चित्रण आपने बखूबी किया है इस रचना  के माध्यम से ..जिसके लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by Sushil Sarna on May 6, 2015 at 12:49pm

आदरणीय  krishna mishra 'jaan'gorakhpuri जी रचना  पर आपकी स्नेहिल ऊर्जावान प्रशंसा का तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 5, 2015 at 9:06pm

आम आदमी का दर्द लिए बहुत ही लाजव़ाब कविता आपको दिल से बहुत बहुत बधाई आदरणीय shushil जी!

Comment by Sushil Sarna on May 5, 2015 at 1:08pm

आदरणीय जी  रचना पर  आपकी मधुर प्रशंसा एवं सुझाव का हार्दिक आभार। आपके सुझाव पर अमल करने का प्रयास करूंगा।  इस स्नेह हेतु आपका हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on May 5, 2015 at 1:04pm

आदरणीय मोहन सेठी  जी  रचना पर  आपकी प्रशंसात्मक स्वीकृति का हार्दिक आभार। 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2015 at 1:03pm

बहुत खूब आ. सरना साहब. 
आपकी रचना का बहुत बड़ा हिस्सा किसी न किसी बहर में है. थोडा और प्रयास कर के इसे नज़्म की सूरत में ढाला जा सकता है.
सादर  

Comment by Sushil Sarna on May 5, 2015 at 1:03pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर जी  रचना में निहित भावों को मिली आपकी प्रशंसात्मक स्वीकृति ने रचना का जो मान बढ़ाया है उसके लिए आपका हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on May 5, 2015 at 1:01pm

आदरणीय श्री सुनील  जी रचना में निहित भावों पर आपकी प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on May 5, 2015 at 1:00pm

आदरणीय समर कबीर जी रचना में निहित भावों पर आपकी प्रतिक्रिया ने लेखन को सफल किया।  आपका हार्दिक आभार। 

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