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"भूख में उछाल आ गया"

आदमी की भूख में उछाल आ गया |
पत्थरों को घिस दिया पहाड़ खा गया |

रुख बदल के जल प्रवाह मोड़ ही दिया,
भूख ही थी आदमी कमाल पा गया |

तम निगल कर रौशनी तमाम कर दिया,
जब लगाई युक्ति तो विकास छा गया |

देखकर सबकुछ खुदा मगन दिखा वहाँ,
आदमी को आज का मचान भा गया |

तन मिला दुर्लभ इसे वृथा नहीं किया
जिन्दगी थोड़ी मगर उठान ला गया ||

( मौलिक अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by Chhaya Shukla on April 26, 2015 at 3:11pm

 उत्साह बढाती प्रतिक्रिया का बहुत बहुत धन्यवाद
शिज्जु "शकूर" जी सादर !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 26, 2015 at 9:52am

आदरणीया छाया जी अच्छा प्रयास है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Chhaya Shukla on April 25, 2015 at 6:03pm

आपकी उपस्थिति का बहुत बहुत शुक्रिया !
आदरणीय गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी सादर

Comment by Chhaya Shukla on April 25, 2015 at 6:02pm

उत्साह वर्धन हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीय गिरिराज भंडारी जी .... सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 23, 2015 at 11:28pm

आदरणीया छाया जी , प्रयास बहुत अच्छा है , हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 23, 2015 at 1:57pm

छाया जी

मेरी नजर में शेर के दोनों मिसरो में  रब्त की कंमी है . बाकी गुनीजन  बताएं ,

कृपया ध्यान दे...

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