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अतुकांत कविता : मुक्ति (गणेश जी बागी)

मुख पर स्थाई भाव
न राग न द्वेष
शांत और निच्छल
पूर्णता को प्राप्त

जिन्दगी की भाग-दौड़
बहू की भुन-भुन
बेटे की झिड़की 
पत्नि की देखभाल

और ....

महंगी दवाइयों से
मिल गयी मुक्ति
 

चल पड़ा वो
सब कुछ त्याग
महा-यात्रा पर....

(मौलिक व अप्रकाशित)
पिछला पोस्ट => तरही ग़ज़ल (तू रात की रानी है)

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 15, 2015 at 10:24pm

जीवन की अंतिम सच्चाई यही है सब यहीं छोड़ कर जाना है सुख हो या दुःख एक गंभीर मर्म को कुछ शब्दों में बाँध कर प्रस्तुत करना आसान नहीं प्रशंसनीय है सराहनीय है आपका यह प्रयास ...बहुत मर्मस्पर्शी रचना ...बधाई आपको |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 15, 2015 at 5:44pm

सराहना हेतु आभार आदरणीय जीतेन्द्र जी.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 15, 2015 at 5:43pm

आदरणीय श्री सुनील जी, कविता आप तक पहुंची तथा आप द्वारा सराही गयी इसके लिए आपको हृदय से आभार.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 15, 2015 at 5:30pm

आदरणीय बागी जी

बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति  i स्थाई भाव  में अधूरापन सा लगता है   i साहित्य की दृष्टि से देखें तो यहाँ पर शांत-रस का स्थाई भाव निर्वेद ठीक बैठता है तो शुरुआत ऐसे हो सकती थी -   मुख-पर शांत रस

                                                                        का स्थाई भाव 'निर्वेद '

                                                                         न राग न द्वेष -------    सादर

Comment by rajkumarahuja on April 15, 2015 at 1:17pm

  " देखन में छोटा लगे , घाव करे गंभीर  "  उक्ति को चरितार्थ करती भावपूर्ण रचना ! इस भौतिक युग के कटु-सत्य को आपने बहुत कम शब्दों में उकेरा है माननीय " गणेश बागी जी " ......सुन्दर रचना हेतु .....साधुवाद  !

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 15, 2015 at 11:08am

बहुत मर्मस्पर्शी कविता ,सर. छोटी किन्तु बहुत गंभीर घाव देती पंक्तियों पर बधाई

Comment by shree suneel on April 15, 2015 at 1:52am
आदरणीय गणेश जी, संक्षिप्त एवं सम्पूर्ण कविता का अच्छा उदाहरण है आपकी ये रचना.
बधाई आपको.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 14, 2015 at 10:57pm

सराहना हेतु हार्दिक आभार आदरणीय कृष्णा मिश्रा जी.

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 14, 2015 at 10:36pm

सुन्दर रचना पर बधाई आदरणीय!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 14, 2015 at 10:17pm

आदरणीया निधि जी, आपकी टिप्पणी उत्साहवर्धन कर रही है, सराहना हेतु आभार.

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