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हॉकी खेलने जाती लड़कियां

पैरों में एक जोड़ी हवाई चप्पल,

और छोटी छोटी ख़्वाहिशों से चमकती आँखों  के साथ

हाथों में स्टिक लिए

कुछ लड़कियां हॉकी  खेलने जाती है

भागती है गेंद के पीछे

गेंद में छुपा बैठा है पेट भर खाने का सुख

पहाड़ के उस पार

जंगलों के बीचों बीच नंगे पाँव

एक वृद्ध आदिवासी दंपति

सखुआ के पत्तों को हटाकर

पौधों की जड़ें खोद

रात के खाने का इंतजाम करता है।

उसने कभी हॉकी का स्टिक नहीं देखा है

पर वह सपने देखता है

गेंद  से निकलते गरम माड़ और भात का। 

 मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on April 5, 2015 at 9:16pm

आदरणीय नीरज जी , बहुत खूब , बहुत बहुत बधाई आपको इस सुन्दर रचना पर ! सादर 

Comment by Neeraj Neer on April 5, 2015 at 10:48am

आ॰ मिथिलेश वामनकर जी आपको कविता पसंद आई ... हार्दिक आभार आपका॥ 

Comment by Neeraj Neer on April 5, 2015 at 10:47am

आपको कविता में निहित संवेदना पसंद आई , आपका हार्दिक आभार आ॰ डॉ विजय शंकर जी ... 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 5, 2015 at 12:56am

आदरणीय नीरज कविता की संवेदना से भरपूर जुड़ते हुए जी भर आया. इस सशक्त प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 4, 2015 at 6:23pm
विविधितायें तो असीमित हैं पर आपका संवेदनशील होना अनुपम है। बधाई , आदरणीय नीरज कुमार जी, सादर।
Comment by Neeraj Neer on April 4, 2015 at 6:06pm

आ॰ डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव साहब आपके आशीष और स्नेह के लिए आपका हार्दिक आभार ..... 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 4, 2015 at 6:03pm

आ० नीरज भाई

आपकी कवितायेँ पढता रहता हूँ . आप अपनी कविता में जो संवेदना लाते हो उससे मन भर आता है . आप बहुत आगे तक जांए . सादर .

कृपया ध्यान दे...

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