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ग़ज़ल : एक वो थी एक मैं था एक दुनिया जादुई

बह्र : २१२२ २१२२ २१२२ २१२

रूह को सब चाहते हैं जिस्म दफ़नाने के बाद
दास्तान-ए-इश्क़ बिकती खूब दीवाने के बाद

शर्बत-ए-आतिश पिला दे कोई जल जाने के बाद
यूँ कयामत ढा रहे वो गर्मियाँ आने के बाद

कुछ दिनों से है बड़ा नाराज़ मेरा हमसफ़र

अब कोई गुलशन यकीनन होगा वीराने के बाद


जब वो जूड़ा खोलते हैं वक्त जाता है ठहर
फिर से चलता जुल्फ़ के साये में सुस्ताने के बाद

एक वो थी एक मैं था एक दुनिया जादुई
और क्या कहने को रहता है इस अफ़साने के बाद
----
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by Shyam Narain Verma on March 19, 2015 at 11:30am
बहुत सुन्दर ग़ज़ल! आपको हार्दिक बधाई!
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 19, 2015 at 10:33am

तह-द-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आ. वन्दना जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 19, 2015 at 10:31am

बहुत बहुत शुक्रिया आ. rajesh kumari जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 19, 2015 at 10:30am

शुक्रिया जनाब SHARIF AHMED  साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 19, 2015 at 10:30am

बहुत बहुत शुक्रिया आ. umesh katara जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 19, 2015 at 10:29am

बहुत बहुत धन्यवाद आ. Hari Prakash जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 19, 2015 at 10:29am

बहुत बहुत धन्यवाद Shyam Mathpal जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 19, 2015 at 10:28am

बहुत बहुत शुक्रिया आ. गोपाल नारायन जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 19, 2015 at 10:28am

शुक्रिया आ.मिथिलेश वामनकर जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 19, 2015 at 10:27am

बहुत बहुत धन्यवाद आ.  Vijai Shanker जी

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