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ग़ज़ल : ज़ुल्फ़ का घन घुमड़ता रहा रात भर

बह्र : २१२ २१२ २१२ २१२

 

ज़ुल्फ़ का घन घुमड़ता रहा रात भर

बिजलियों से मैं लड़ता रहा रात भर

 

घाव ठंडी हवाओं से दिनभर मिले

जिस्म तेरा चुपड़ता रहा रात भर

 

जिस्म पर तेरे हीरे चमकते रहे

मैं भी जुगनू पकड़ता रहा रात भर

 

पी लबों से, गिरा तेरे आगोश में

मुझ पे संयम बिगड़ता रहा रात भर

 

जिस भी दिन तुझसे अनबन हुई जान-ए-जाँ

आ के ख़ुद से झगड़ता रहा रात भर

---------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2015 at 12:31pm
तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आदरणीय सौरभ जी। स्नेह बना रहे। तीसरे शे’र पर आपसे सहमत हूँ। इसको और समय देने की आवश्यकता है।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2015 at 12:26pm
बहुत बहुत शुक्रिया नज़ील साहब

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 1, 2015 at 11:57am

ज़ुल्फ़ का घन घुमड़ता रहा रात भर
बिजलियों से मैं लड़ता रहा रात भर..  .. आपके अंदाज़ का मतला हुआ है, आदरणीय

घाव ठंडी हवाओं से दिनभर मिले
जिस्म तेरा चुपड़ता रहा रात भर........... कहना ही क्या .. इस भाव को शाब्दिक करने केलिए बार-बार बधाई..

जिस्म पर तेरे हीरे चमकते रहे
मैं भी जुगनू पकड़ता रहा रात भर.......... इस शेर का मेयार बहुत बड़ा है. मेरे हिसाब से इस शेर को और समय देना उचित होगा..

पी लबों से, गिरा तेरे आगोश में
मुझ पे संयम बिगड़ता रहा रात भर......... संयम के बिगड़ने या क्रोधित होने का ज़वाब नहीं, भाईजी.. कमाल-कमाल !

जिस भी दिन तुझसे अनबन हुई जान-ए-जाँ
आ के ख़ुद से झगड़ता रहा रात भर............ वल्लाह ! इस स्वीकृति पर कौन ’तुझ’ न क़ुर्बान हो जाये !!..

आदरणीय धर्मेन्द्रभाईजी, आपकी इस ताब की ग़ज़ल ढेर दिनों बाद सामने आयी है. दिल से बधाई स्वीकारें.

Comment by Nazeel on April 1, 2015 at 11:12am

आदरणीय भाई धर्मेन्द्र जी अच्छी रचना हुई है  हार्दिक शुभकाएँ।
//ज़ुल्फ़ का घन घुमड़ता रहा रात भर
बिजलियों से मैं लड़ता रहा रात भर///     शेयर  के  लिए  एक बार   फिर से दिली दाद।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2015 at 10:56am
बहुत बहुत शुक्रिया आ. आशुतोष जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2015 at 10:55am
बहुत बहुत शुक्रिया नीलेश जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2015 at 10:54am
ज़र्रानवाजिश का बहुत बहुत शुक्रिया आ. गिरिराज जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2015 at 10:53am
तह-द-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आ. समर साहब
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2015 at 10:53am
बहुत बहुत शुक्रिया आ. सोमेश जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2015 at 10:52am
बहुत बहुत शुक्रिया आ. दिनेश कुमार जी

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