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चाहिये गंगा नहाना जा नहाते गंदगी में ,

२१२२ २१२२ २१२२ २१२२ - रमल मुसम्मन सालिम
छोड़ कर आतंक का दर नेक कोई काम करते |
जान  लेने  के सिवा सारे जहाँ में नाम करते |
लोग जो आये जहाँ में  चाँदनी सब के लिए है ,
तोड़  घेरा  बादलों का दे  खुशी आराम  करते |
चाहिये    गंगा   नहाना   जा नहाते गंदगी में ,
सादगी का सोच रख कर ही जहाँ में काम करते |
हर पुराणों में लिखा है जीव खुश रह कर चले गा  ,
मात  देना  छोड़  दो जो आह सा  पैगाम करते |
देश दुनिया खुश रहे खुश  लोग सारे  हो  चमन में  ,
लोग ऐसे  ना   मरे मिल मौत को नाकाम करते |
आदमी   ही    आदमी   को   रंज में खा जा रहा है , 
छोड़ वर्मा दानवी पथ सब  खुशी से काम  करते |
श्याम नारायण वर्मा 
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Shyam Narain Verma on March 19, 2015 at 10:12am

आदरणीय गिरिराज जी , गुमनाम जी , मिथिलेश जी और हरी प्रकाश जी रचना भाव पसंद करने के लिए आप लोगों का बहुत बहुत आभार |
सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on March 18, 2015 at 9:20pm

आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सुन्दर ग़ज़ल है , बधाई आपको इस रचना पर ! सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 18, 2015 at 8:50pm

आदरणीय श्याम जी, सुन्दर ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई 

Comment by gumnaam pithoragarhi on March 18, 2015 at 5:33pm
इस सुन्दर प्रभावशाली प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई भाई जी ........

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 18, 2015 at 4:59pm

आदरणीय श्याम भाई , लाजवाब गज़ल हुई है , बहुत सुन्दर संदेश दिया है आपने ! आपको हार्दिक बधाइयाँ , गज़ल के लिये ।

Comment by Shyam Narain Verma on March 18, 2015 at 2:34pm

सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 18, 2015 at 1:26pm
वाह बहुत सुन्दर लिखा आपने । सुन्दर सन्देश देती रचना संग्रहनीय लगी
Comment by Shyam Narain Verma on March 18, 2015 at 12:42pm

आदरणीय ,  रचना भाव पसंद करने के लिए आभार |

सादर।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 18, 2015 at 12:13pm

आओ श्याम नारायण वर्मा जी

बहुत ही सुन्दर प्रयास  .  आपको बधायी .

Comment by Shyam Narain Verma on March 18, 2015 at 11:59am

आदरणीय  श्याम मठपाल जी और आदरणीय सोमेश कुमार जी रचना भाव पसंद करने के लिए आभार |

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