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ग़ज़ल -- आरज़ू दिल की दिल में दबी रह गई ....

212-212-212-212

आरज़ू दिल की दिल में दबी रह गई
ज़िन्दगी में मेरी कुछ कमी रह गई

ज़ख़्म नासूर मेरे सभी बन गए
दिल में अब आँसुओं की नदी रह गई

ज़ेहन के आईनों पर था पर्दा पड़ा
मुझ से कमज़ोरी मेरी छुपी रह गई

आस्तीनों में ख़ंजर छुपाए हुए
दोस्ती तो फ़क़त नाम की रह गई

बागबाँ ही चमन का है दुश्मन बना
सहमी सहमी यहाँ हर कली रह गई

अब न चिड़ियों का घर में बसेरा रहा
चहचहाहट की पीछे सदी रह गई

अब के बेमौसमी जो हुईं बारिशें
सब किसानों की आशा धरी रह गई

छोड़ कर जब बुढ़ापे में बेटा गया
बूढ़ी आँखों में बस बेबसी रह गई

हम सभी एक ईश्वर की सन्तान है
पुस्तकों में इबारत लिखी रह गई

मौत ने जब दबोचा तो इन्सान की
सारी तैय्यारी ठिठकी ठगी रह गई

-- दिनेश कुमार १५/०३/२०१५

( मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by सूबे सिंह सुजान on March 18, 2015 at 12:04am
बधाई हो भाई अच्छी गजल कह पाये हो
Comment by gumnaam pithoragarhi on March 17, 2015 at 8:05pm
हम सभी एक ईश्वर की सन्तान है
पुस्तकों में इबारत लिखी रह गई

मौत ने जब दबोचा तो इन्सान की
सारी तैय्यारी ठिठकी ठगी रह गई

आस्तीनों में ख़ंजर छुपाए हुए
दोस्ती तो फ़क़त नाम की रह गई

दिनेश भाई जी , अच्छी गज़ल हुई है , आपको हार्दिक बधाई ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 16, 2015 at 9:56pm

अब न चिड़ियों का घर में बसेरा रहा
चहचहाहट की पीछे सदी रह गई

अब के बेमौसमी जो हुईं बारिशें
सब किसानों की आशा धरी रह गई

छोड़ कर जब बुढ़ापे में बेटा गया
बूढ़ी आँखों में बस बेबसी रह गई

बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई दिनेश भैय्या ये शेर तो बहुत ही ख़ास लगे 

बहुत बहुत बधाई 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 16, 2015 at 7:35pm

आ० दिनेश जी

अब न चिड़ियों का घर में बसेरा रहा
चहचहाहट की पीछे सदी रह गई

छोड़ कर जब बुढ़ापे में बेटा गया
बूढ़ी आँखों में बस बेबसी रह गई------------------------बेहतरीन . सुंदर .

Comment by Shyam Mathpal on March 16, 2015 at 3:32pm

Aadarniya Denesh Kumar Ji,

Bahut sundar rachna ke liye dili mubarakbad. Sahi aayana dikhaya aapne.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 16, 2015 at 1:21pm

आदरणीय दिनेश भाई , अच्छी गज़ल हुई है , आपको  हार्दिक बधाई ।

छोड़ कर जब बुढ़ापे में बेटा गया
बूढ़ी आँखों में बस बेबसी रह गई    ----- बहुत खूब , आदरनीय ! दिली बधाई इस शे र के लिये ।

Comment by umesh katara on March 16, 2015 at 8:30am

छोड़ कर जब बुढ़ापे में बेटा गया
बूढ़ी आँखों में बस बेबसी रह गई---------वाहहहहहहहहहहह जनाब वाहहहहहहहहहहह

Comment by Hari Prakash Dubey on March 16, 2015 at 3:42am

आदरणीय दिनेश जी, सुन्दर ग़ज़ल है ,बधाई आपको !

Comment by दिनेश कुमार on March 15, 2015 at 11:53pm
ध्यान दिलाने के लिए बहुत बहुत आभारी हूँ भाई मिथिलेश जी। मैंने इस मिसरे पर कोशिश की थी -- मेरी हसरत दबी की दबी रह गई...यह तरही मिसरा दिया गया था। मैं कल तक अपना मतला बदल दूँगा आदरणीय भाई। पुनः शुक्रिया। कल आता हूँ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 15, 2015 at 11:34pm
आदरणीय दिनेश भाई बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई।
मतला किसी ग़ज़ल के मतले को छू रहा है। किसी एलबम में सुनी थी वो ग़ज़ल। कृपया मतला पर पुनर्विचार निवेदित है। मतला कुछ यूं है-
ये कसक दिल की दिल में दबी रह गई
ज़िन्दगी में तुम्हारी कमी रह गई।
सादर

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