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शेरों की दुनियाँ---डा० विजय शंकर

शेरों की दुनियाँ अजीब ,
जमाना अजीब होता है,
हर शेर अज़ब होता है,
हर शेर गज़ब होता है,
शेर सवाल, शेर जवाब होता है
शेर का जवाब भी शेर होता है
शेर पर शेर , सवा सेर होता है |

हमको भी शौक चर्राया,
हम भी आ गए शेरों के बीच ,
अपने चूहे बिल्ली लेकर ,
उन्होंने वो हंगमा बरपाया
कि शेर शेर घबड़ाया , बोला ,
अरे ,ये कौन शेर के जंगल में चला आया |

शेरों की अपनी एक तहजीब होती है ,
एक अदब , एक तमीज होती है ,
क़यामत होती है , एक अलग तरह की ,
बला की नरमी के साथ , और
भरपूर नफ़ासत के साथ होती है,
यूँ ही नहीं कूद पड़ता कोई शेर बन कर ,
यूँ ही शोर मचाओगे तो कहाँ से दाद पाओगे ,
उसके लिए तो मियाँ अदा चाहिए ,
शेर शेर के लिए , सदा चाहिए ,
यूँ ही चिल्ल पों मचाओगे ,
तो शेर क्या , गीदड़ ही रह जाओगे ,
शायरी तो दर्द है, इश्क है, हुस्न है,
हुस्न का जिक्र है , हुस्न की फ़िक्र है,
मेहबूबा की बात है, मेहबूबा से बात है,
मेहबूब की आन है , मेहबूब का बयान है.
आजकी शायरी तो बस तकलीफ़ें ,
बस तकलीफ़ें ही बयाँ करती रहती है,
यूँ तो इश्क,मेहबूब,मेहबूबा भी बस तकलीफें ही देते हैं,
आज तो तकलीफें ही इश्क और माशूक बने बैठे हैं |

मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर

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Comment by Dr. Vijai Shanker on February 25, 2015 at 9:39pm
आदरणीय सुशील सरना जी , रचना आपको पसंद आई ,आभार ,आपकी सद्भावनाओं के लिए आपका धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on February 25, 2015 at 9:37pm
आदरणीय महिर्षि त्रिपाठी जी , रचना आपको पसंद आई ,आभार , बधाई के लिए भी आपका धन्यवाद , सादर।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 9:36pm

वाह! बेहतरीन रचना. आपकी यह ,एक  अलग ही अंदाज लिए कविता पढ़कर मन आनंदित हो गया, आदरणीय डा. विजय जी. बहुत-बहुत बधाई , सर.

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 25, 2015 at 9:35pm
आदरणीय डॉ o गोपाल नारायण जी , रचना आपको पसंद आई ,आपकी स्वीकृति मायने रखती है ,रचना को सार्थकता प्रदान करती है , बहुत बहुत आभार आपका , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on February 25, 2015 at 9:31pm
आदरणीय परी एम श्लोक जी , रचना आपको पसंद आई ,आभार , आपकी बधाई के लिए भी ह्रदय से धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on February 25, 2015 at 9:29pm
आदरणीय उषा चौधरी साहनी जी , रचना को आपके द्वारा मिली प्रशस्ति से अनुगृहीत हूँ , आपकी बधाई के लिए भी ह्रदय से धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on February 25, 2015 at 9:27pm
आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी , रचना की आपके द्वारा मिली स्वीकृति से अनुगृहीत हूँ , आपकी बधाई हेतु ह्रदय से धन्यवाद , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 25, 2015 at 9:26pm

बहुत सुन्दर सर, क्या खूब तेवर है इस रचना के.... इस सशक्त प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ विजय शंकर सर....

सर ये पंक्तियाँ बड़ी ही मजेदार हुई है 

हमको भी शौक चर्राया,
हम भी आ गए शेरों के बीच ,
अपने चूहे बिल्ली लेकर ,
उन्होंने वो हंगामा बरपाया
कि शेर शेर घबड़ाया , बोला ,
अरे ,ये कौन शेर के जंगल में चला आया |.... बेहतरीन 

Comment by Sushil Sarna on February 25, 2015 at 7:15pm

आदरणीय रचना की इन पंक्तियों के लिए दिली दाद कबूल फरमाएं
''शायरी तो दर्द है, इश्क है, हुस्न है,
हुस्न का जिक्र है , हुस्न की फ़िक्र है,
मेहबूबा की बात है, मेहबूबा से बात है,
मेहबूब की आन है , मेहबूब का बयान है.''

Comment by maharshi tripathi on February 25, 2015 at 6:02pm

शायरी तो दर्द है, इश्क है, हुस्न है,
हुस्न का जिक्र है , हुस्न की फ़िक्र है,

इन लाइनों पर आपको हार्दिक बधाई आ. विजयशंकर जी |

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