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"यार सुरेश देखो! हमारा देश अब कितनी प्रगति कर रहा है।"
"मुझे तो अभी ऐसा कहीं कुछ नजर नहीं आ रहा है।"
"यार लगता है तुम टी वी नहीं देखते हो।"

मौलिक और अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 14, 2015 at 10:36am

सटीक व्यंग्य वाह बढ़िया लघु कथा |

Comment by aman kumar on January 14, 2015 at 9:27am

मात्र टी वी ही नही अख़बार भी विज्ञापनों  के लिए ही छपते मालूम होते है .सही नव्ज पकड़ी है आपने ...आभार 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on January 13, 2015 at 5:31pm

कहें तो गागर में सागर! बहुत ही सुन्दर! अचूक निशाना और  भी बहुत कुछ 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 13, 2015 at 5:22pm

बहुत खूब ! बहुत खूब !! बहुत खूब !!!

हार्दिक बधाइयाँ

Comment by विनोद खनगवाल on January 13, 2015 at 4:32pm
आप सभी का सम्मान के साथ दिल से आभार व्यक्त करता हूँ।
Comment by विनय कुमार on January 12, 2015 at 3:52pm

बहुत सटीक एवम मौजूं लघुकथा | बहुत बहुत बधाई..

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 12, 2015 at 11:57am

कम शब्दों में बहुत कुछ कहती लघुकथा. सच ! कुछ लोग टेलीविजन और नेट के माध्यम से ही अच्छे-बुरे कि तुलना कर लेते है. बहुत-बहुत बधाई आदरणीय विनोद जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 11, 2015 at 5:08pm

देश का विकास ज़मीन की जगह मीडिया की जुबानी ही दिखाई देने पर अच्छा व्यंग किया है..

सुन्दर लघुकथा हुई है आ० विनोद जी 

हार्दिक बधाई 

Comment by somesh kumar on January 10, 2015 at 9:50pm

कई दिनों बाद मंच पर आए ,और आते ही नो-बॉल पर छक्का |बहुत बधाई इस कसी हुई मारक लघुकथा हेतू 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 10, 2015 at 9:40pm

बहुत खूब आदरणीय विनोद जी, सही कहा, टीवी में देश लगातार प्रगति करते जा रहा है, गरीब भी अमीर हो रहें हैं, बधाई इस बेहतरीन लघुकथा पर.

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