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जीवन तो है एक नदी

कभी निकटता रिश्तों में ,

ज्यों सागर की गहराई !

कभी दूरियाँ अपनों में,

ज्यों अम्बर की ऊँचाई  !

 

कभी सहजता चुप्पी में,

कभी जटिलता बोली में !

कभी बर्फ मैं ज्वाला किंतु,

आंच नहीं अब होली मैं !

 

कहीं मोहब्बत की म्यानों में,

रखी बैर की शमशीरें !

कहीं इबारत उलटी यारों ,

जहाँ लिखी हैं तक़दीरें !

 

कहीं सत्य एक झंझट,

कही झूठ है सुलझा !

कहीं किसी ने जाल बिछाया

खुद ही आकर उलझा !

 

कहीं प्रेम का इन्द्रधनुष,

कहीं घृणा की बौछारें !

जीवन तो है एक नदी ,

पर अलग अलग इसकी धारें!

 

जीवन तो है एक नदी ,

पर अलग अलग इसकी धारें!

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

 

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on January 2, 2015 at 7:58pm

आदरणीय "जितेन्द्र पस्टारिया सर" उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु  आपका हार्दिक आभार ! सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 2, 2015 at 7:46pm

कहीं सत्य एक झंझट,

कही झूठ है सुलझा !

कहीं किसी ने जाल बिछाया

खुद ही आकर उलझा !..........बहुत सुंदर. सत्य को बहुत हद तक परिभाषित करती पंक्ति. बधाई आदरणीय हरिप्रकाश जी

Comment by Hari Prakash Dubey on January 2, 2015 at 6:52pm

 मन प्रसंन्न हो गया , उत्साहवर्धन के लिए आपका आभार  सोमेश भाई !

Comment by somesh kumar on January 1, 2015 at 11:56pm

जीवन एक नदी है ,है इसको अविरल बहना 

सागर अंतिम लक्ष्य वहाँ तक ऊँच-नीच सहना 

तेरी नई-नई कविताओं पर भाई इतना ही कहना 

बहना-बहना सदा नए भाव में ऐसे ही बहना |

Comment by Hari Prakash Dubey on January 1, 2015 at 9:53pm

रचना पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत - बहुत धन्यवाद  आदरणीय गिरिराज सर ! सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 1, 2015 at 9:27pm

आदरणीय हरि प्रकाश भाई , बढिया गीत रचना हुई  है  , आपको दिली बधाइयाँ । 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 1, 2015 at 8:35pm

रचना की सराहना एवम् आपकी उत्साहवर्धक पर्तिक्रिया पर  बहुत बहुत धन्यवाद,  आदरणीय खुर्शीद खैरादी जी,  सादर।

Comment by Hari Prakash Dubey on January 1, 2015 at 8:31pm

आदरणीय डॉo गोपाल नारायण सर ,रचना पर आपकी उपस्तिथी ही उत्साहवर्धक है ,आभार सादर।

Comment by khursheed khairadi on January 1, 2015 at 2:17pm

कहीं सत्य एक झंझट,

कही झूठ है सुलझा !

कहीं किसी ने जाल बिछाया

खुद ही आकर उलझा !

आदरणीय हरि प्रकाश सर काफ़ी चिंतन तथा दर्शन से परिपूर्ण  रचना है |सभी बंध सुन्दर है |नववर्ष की ढेरों शुभकामनाओं सहित -सादर अभिनन्दन |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 1, 2015 at 1:08pm

sundar bhavpoorn kavita

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