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राम लीला (लघुकथा )

और भाई, इस बार तो तूने पूरी राम लीला देख ली क्या सीखा ?

भईया, रामचरितमानस की कथा के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ की पिता का कहना नहीं मानना चाहिए, इससे बहुत तकलीफ उठानी पड़ती है !!

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Hari Prakash Dubey on January 1, 2015 at 8:14pm

उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार  आदरणीय आदरणीय जितेन्द्र पस्टारिया जी ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 1, 2015 at 10:04am

आपके उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार  आदरणीय शिज्जू सर !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 1, 2015 at 7:58am

आदरणीय हरिप्रसाद दूूबे जी सही जगह आपने चोट की है बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिये

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 1, 2015 at 6:19am

आज को देखते हुए, बहुत ही सटीक सन्देश छोडती हुयी लघुकथा. बहुत-२ बधाई आदरणीय हरि प्रकाश जी

Comment by Hari Prakash Dubey on December 31, 2014 at 8:08pm

आपके उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार  आदरणीया अर्चना तिवारी जी !

Comment by Hari Prakash Dubey on December 31, 2014 at 8:07pm

आपके प्रतिक्रिया  के लिए आपका हार्दिक आभार  सोमेश भाई  !

Comment by Hari Prakash Dubey on December 31, 2014 at 7:53pm

रचना आपको  पसंद  आई ,  बहुत  बहुत आभार आदरणीय खुरशीद  जी !

Comment by somesh kumar on December 31, 2014 at 4:06pm

सुंदर भाव ,आज के बेटे यही निष्कर्ष निकालते हैं 

Comment by khursheed khairadi on December 31, 2014 at 11:23am

हा.. हा... हा... क्या ख़ालिश तंज़ है ,मज़ा आ गया |सादर अभिनन्दन आदरणीय हरि प्रकाश जी |

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