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"घर जला अपना जश्न कब तक मनाओगे"

राजा बहुत हैं, शतरंज के इस खेल में,

इनक़लाब का शोर कब तक मचाओगे ?

 

अभाव बहुत हैं, अंधेरों के इस खेल में ,

गीत उजियारो के कब तक सुनाओगे  ?

 

तलवारें बहुत हैं, अधर्म के इस खेल में,

भाई-भाई का नारा कब तक लगाओगे ?

 

सयानें बहुत हैं, राजनीति के इस खेल में,

मूर्ख किसको और कब तक बनाओगे  ?

 

किसने क्या पाया ,माया के इस खेल में,

घर जला अपना जश्न कब तक मनाओगे ?

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 744

Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on January 4, 2015 at 11:04pm

आदरणीय जवाहर जी , रचना आपको पसन्द आई ,उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद !

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on January 4, 2015 at 6:25pm

किसने क्या पाया ,माया के इस खेल में,

घर जला अपना जश्न कब तक मनाओगे ?

बेहतरीन रचना ...बधाई!

Comment by Hari Prakash Dubey on January 3, 2015 at 8:45pm

आदरणीय  गिरिराज  भंडारी सर , बहुत बहुत  आभार आपका !

Comment by Hari Prakash Dubey on January 3, 2015 at 8:43pm

शिशिर जी , रचना पर आपकी सराहना के  लिए आपका आभार !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 3, 2015 at 8:32pm

आदरणीय हरि प्रकाश भाई , वर्तमान की विडम्बनाओं का बढिया बयान है , आपको दिली बधाई ।

Comment by Shishir Dwivedi on January 2, 2015 at 9:53pm
आदरणीय हरिप्रकाश दुबे जी
बहुत उम्दा लिखा है आपने
पढ़ के मन प्रफुल्लित हो गया
Comment by Hari Prakash Dubey on January 2, 2015 at 8:52pm

उत्साहवर्धन  हेतु आपका हार्दिक आभार आदरणीय खुरशीद जी ! सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on January 2, 2015 at 8:08pm

आदरणीय गोपालनारायण  सर , आपके आशीर्वाद के लिए कृतज्ञ हूँ ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 2, 2015 at 8:01pm

आदरणीय अनुराग जी , आपकी बात ठीक से समझ नहीं पाया , कृपया स्पष्ट करने की कृपा करैं !

Comment by Anurag Prateek on January 2, 2015 at 7:49pm

मैं तकती’अ करने में नाकामयाब रहा , मदद करें श्रीमान 

कृपया ध्यान दे...

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