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कौन जाने ?

बद्दुआओ में होता है असर 

वाणी के जहर 

ये काटते तो है

पर देते नहीं लहर

 

पुरा काल में

इन्हें कहते थे शाप

ऋषियों-मुनियों के पाप

दुर्वासा इसके

पर्याय थे आप

 

भोगता था

अभिशप्त वाणी की मार 

कभी शकुन्तला

या अहल्या सुकुमार

आह !आह ! ऋषि के

वे वाक्-प्रहार

 

मोक्ष भी

होता कभी शाप वह घोर

हंसता अभिशप्त का

जीवन मरोर

दुख के अर्णव में  

सारे सुख बोर

 

 

उनका शाप  

विष-बुझे तीर सा चले

गये सदैव निबल ही  

मुनि-सिद्ध से छले

वे ही समाज के थे

जीव भी भले 

 

कभी-कभी

हम भी देते हैं बद्दुआ

पर बताओ कभी कुछ

असर भी हुआ

किसी को वाणी के

जहर ने छुआ

 

तब बतलाओ 

मेरे मन के मधुर मौन

हम में और उनमे

दोनों में

श्रेष्ठ कौन ?

(मौलिक / अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 1, 2015 at 12:40pm

शिज्जू भाई

बहुत बहुत बधाई i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 1, 2015 at 8:24am

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण सर बेहतरीन कमाल की रचना हुई है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 31, 2014 at 1:06pm

लडी वाला जी

आपका शत-शत आभार i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 31, 2014 at 1:05pm

हरिप्रकाश जी

आपका आभार i

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 31, 2014 at 10:36am

चिंतन मनन परक रचना  हुई है | सुंदर और  भापूर्ण रचना के लिए  हार्दिक बधाई डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी 

Comment by Hari Prakash Dubey on December 30, 2014 at 11:10pm

पुरा काल में

इन्हें कहते थे शाप

ऋषियों-मुनियों के पाप

दुर्वासा इसके

पर्याय थे आप.........ये हुई शानदार रचना ,एक दम दिल से निकली हुई ....हार्दिक बधाई  आदरणीय डॉ .गोपाल नारायण सर ! सादर ..

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 30, 2014 at 2:27pm

सोमेश कुमार जी

आपका आभार आत्मीय  !

Comment by somesh kumar on December 30, 2014 at 2:24pm

तब बतलाओ 

मेरे मन के मधुर मौन

हम में और उनमे

दोनों में

श्रेष्ठ कौन ?

सुंदर रचना 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 30, 2014 at 2:02pm

आ० सरना जी

आपका प्यार हमें स्वीकार i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 30, 2014 at 2:00pm

आ०  खुर्शीद जी

आपका सादर आभार i

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