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ग़ज़ल : समझा था जिसको आम वो बंदा खजूर था

बह्र : २२१२ १२११ २२१२ १२

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अपनी मिठास पे उसे बेहद गरूर था

समझा था जिसको आम वो बंदा खजूर था

 

मृगया में लिप्त शेर को देखा जरूर था

बकरी के खानदान का इतना कसूर था

 

दिल्ली से दिल मिला न ही दिल्ली में दिल मिला

दिल्ली में रह के भी मैं यूँ दिल्ली से दूर था

 

शब्दों में विश्व जीत के शब्दों में छुप गया

लगता था जग को वीर जो शब्दों का शूर था

 

हीरे बिके थे कल भी बहुत, आज भी बिकें

लेकिन नहीं बिका जो कभी, कोहिनूर था

 

शब भर मैं गहरी नींद में कहता रहा ग़ज़ल

दिन में पिये जो अश्क़ ये उनका सुरूर था

-----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 17, 2015 at 6:58pm

बहुत बहुत शुक्रिया मिथिलेश वामनकर  जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 17, 2015 at 6:57pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ rajesh kumari जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 17, 2015 at 6:57pm

बहुत बहुत धन्यवाद laxman dhami जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 17, 2015 at 6:57pm

बहुत बहुत धन्यवाद शिज्जु जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 17, 2015 at 6:57pm

शुक्रिया  saalim sheikh  साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 17, 2015 at 6:56pm

बहुत बहुत धन्यवाद  गिरिराज भंडारी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 17, 2015 at 6:56pm

शुक्रिया gumnaam pithoragarhi जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 17, 2015 at 6:56pm

बहुत बहुत धन्यवाद Shyam Narain Verma जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 17, 2015 at 6:55pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ सौरभ जी। स्नेह बना रहे

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 17, 2015 at 6:55pm

बहुत बहुत धन्यवाद Rahul Dangi जी

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