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उमेश कटारा-ग़ज़ल

मेरे हक़ में,खि़लाफ़त में, कोई तू फैसला तो दे
सज़ा-ऐ-मौत ही दे दे ,मेरे मुन्सिफ़ सज़ा तो दे

हुनर तेरा तू ही जाने ,बसाकर घर उज़ाडा है
लगाकर आग़ हाथों से,मेरे घर को ज़ला तो दे

व़फादारी तेरी आँखों में अब ढ़ूँढ़े नहीं मिलती
नज़र गद्दार है तेरी ,ज़रा इसको झुका तो दे

मेरे ही वास्ते तूने सज़ाकर जहर का प्याला
रख़ा है घोलकर कब से जरा मुझको पिला तो दे

चला में छोड़ के दुनिया मुबारक़ हो जहाँ तुझको
तसल्ली मिल गयी होगी, जरा अब मुस्क़रा तो दे 

मौलिक व अप्रकाशित
उमेश कटारा










 

 

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Comment

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Comment by umesh katara on December 21, 2014 at 9:24am

शुक्रिया मिथिलेश वामनकर साहब


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 20, 2014 at 5:16am

व़फादारी तेरी आँखों में अब ढ़ूँढ़े नहीं मिलती
नज़र गद्दार है तेरी ,ज़रा इसको झुका तो दे....बेहतरीन ग़ज़ल का उम्दा शेर....बधाई आपको 

Comment by umesh katara on November 5, 2014 at 8:58am

शुक्रिया बैद्यनाथ सारथी जी

Comment by umesh katara on November 5, 2014 at 8:57am

शुक्रिया आलोक मित्तल जी

Comment by Alok Mittal on November 3, 2014 at 1:09pm

बहुत सुंदर ग़ज़ल आपकी वाह्ह

Comment by Saarthi Baidyanath on November 1, 2014 at 10:33pm

तसल्ली मिल गयी होगी, जरा अब मुस्क़रा तो दे ...क्या अंदाज़ ! बहुत खूब आदरणीय  ! मुबारकबाद !

Comment by umesh katara on November 1, 2014 at 2:12pm

शुक्रिया Narendrasinh chauhan sahb

Comment by umesh katara on November 1, 2014 at 2:11pm

शुक्रिया निलेश नूर साहब

Comment by umesh katara on November 1, 2014 at 2:11pm

शुक्रिया गिरिराज भण्डारी जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 1, 2014 at 11:36am

आ.मुकेश भाई , बहुत खूब सूरत गज़ल कही है , दिली बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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