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क्योकि में इक नदी हूँ
मेरा कोई दोष नहीं
फिर भी मैं दोषी हूँ
करते तुम सब लोग हो
भरती मैं हूँ ..
क्योकि में इक नदी हूँ
मुझमे भी जीवन है
मेरा भी  अस्तित्व है
मेरी एक पहचान है
जो लोग करते पूजा हैं  
वही गंदगी भी देते हैं  
चुपचाप सब सहती हूँ
क्या करूँ मैं इक नदी हूँ ...
जागो अब भी जागो
विलुप्त हो जाऊ उस से
पहले मुझे बचा लो
नहीं तो रह जाओगे प्यासे
जैसे बीन पानी मछली तरसे ,
जाने कितने दोहन हुए
सीना चीर मेरा जख्मी किये,
क्योकि में इक नदी हूँ
तुम सब को जीवन देती हूँ !!....

"मौलिक व अप्रकाशित"

आलोक

मथुरा

Views: 553

Comment

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Comment by Alok Mittal on November 1, 2014 at 12:46pm

आदरणीय जितेन्द्र 'गीत' जी आपका दिल से आभार

Comment by Alok Mittal on November 1, 2014 at 12:26pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी.....बेहद शुक्रिया आपका मेरा हौसला बढाने के लिए

Comment by Alok Mittal on November 1, 2014 at 12:25pm

आदरणीय ajay sharma जी.....बहुत बहुत शुक्रिया आपका

Comment by Alok Mittal on November 1, 2014 at 11:43am

आदरणीय rajesh kumari जी.....आपका बहुत बहुत शुक्रिया मेरा हौसला बढाने का

Comment by Alok Mittal on November 1, 2014 at 11:12am

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी.....मेरा हौसला बढाने का आपका आभार

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 1, 2014 at 9:55am

आदरणीय आलोक जी, बहुत ही सुंदर सार्थक चित्रण करती प्रस्तुति पर बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 1, 2014 at 8:29am

आदरणीय आलोक भाई , सामयिक विषय में बढिया बात कही है , बधाई स्वीकार करें ।

Comment by ajay sharma on November 1, 2014 at 12:18am

पहले मुझे बचा लो 
नहीं तो रह जाओगे प्यासे 
जैसे बीन पानी मछली तरसे , 
जाने कितने दोहन हुए 
सीना चीर मेरा जख्मी किये,
क्योकि में इक नदी हूँ 
तुम सब को जीवन देती हूँ !!....samvednayon se saji rachna ,,,wah 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 30, 2014 at 7:44pm

सम सामयिक प्रस्तुति हमे नदियों को बचाना होगा वरना प्रकृति का कहर भुगतना होगा |बधाई आपको. 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 30, 2014 at 3:23pm

ज्वलंत विषय पर अच्छी प्रस्तुति  i

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