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पूर्वगाथा ....(विजय निकोर)

पूर्वगाथा

हादसा नया हो न हो

पुरानी चोट से जगह-जगह

दर्द नया

लहर दर्द की, अब दुखी

तब दुखी

कब रुकी

बहती चली गई

मेघ यादों के आँखों में घने

बरसे, बरसे अनमने

तालाब से नदी, सागर

रातों सियाह महासागर बने

कोई नि:सीम अखण्ड विश्वास

तारिकाएँ नभ में कितनी टूटीं

टूटी नहीं किसी के आने की आस

स्नेह की किरणों की उष्मा में बादल

बने फिर घने, फिर बरसे

भीतर सागर समतल

स्मृतिओं से गुँधते-बिंधते

सैकड़ों दिये किसी के नाम के

दर्द के पट्टे पर

हाथ मेरा फिर से जला

हादसा बचपन का, कल का नया लगा।

---------

 --- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 720

Comment

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Comment by vijay nikore on November 10, 2014 at 5:18pm

//है।रचना आपकी वेदना से शुरू होकर पाठक के मस्तिष्क से होती हुई हृदय तक सहलाने सहज ही पहुंच रही है।

आपके द्वारा प्रयुक्त बिम्ब सदैव बहुत भाते हैं मुझे।//

आपकी इस कदर सराहना मेरे लेखन के लिए संजीवनी है। हार्दिक आभार, आदरणीया विन्दु जी।

Comment by vijay nikore on November 10, 2014 at 5:16pm

//दिल के दर्द को आपने शब्दों में पिरो दिया ....आहा सर क्या कहूँ ....कितना मर्म है आपकी रचना में ....दिल को छु गयी...मन का कोई कोना फिर से हरकत में आ गया ....//

रचना को इतना मान देने के लिए, उसके शब्दों को, भावों को छूने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीया प्रियंका जी।

Comment by vijay nikore on November 10, 2014 at 5:14pm

//आपकी ये रचना पढ़कर शब्द-शब्द मानो दर्द से कराह  रहे हैं दिल को छू गई रचना//

रचना के मर्म को इस प्रकार छूने के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीया राजेश जी।

Comment by vijay nikore on November 10, 2014 at 5:13pm

भावों की मासूमियत को देखने के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय गोपाल नारायन जी।

Comment by vijay nikore on November 10, 2014 at 5:11pm

//मन भावन ह्रदय स्पर्शी इस रचना//

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय आशुतोष जी।

Comment by vijay nikore on November 10, 2014 at 5:09pm

// बहुत सुन्दर रचना हुई है। हृदय को छूने वाली इस रचना के लिये बहुत बहुत बधाई//

रचना को मान देने के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय शिज्जु जी।

Comment by vijay nikore on November 10, 2014 at 5:07pm

//स्मृतियों से जुड़े रहना जीवन और जीवंतता का परिचायक है ...बहुत बहुत बधाई//

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय विजय जी।

Comment by Vindu Babu on October 31, 2014 at 8:12pm

रचना का प्रवाह प्रभावी है आदरणीय।

पूर्व के दर्द का नितनूतन अहसास से ही सघन और हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति होती है।रचना आपकी वेदना से शुरू होकर पाठक के मस्तिष्क से होती हुई हृदय तक सहलाने सहज ही पहुंच रही है।

आपके द्वारा प्रयुक्त बिम्ब सदैव बहुत भाते हैं मुझे। सादर बधाई आपको इस मार्मिक कविता के लिए।

Comment by Priyanka singh on October 12, 2014 at 8:32pm

आदरणीय सर 

   दिल के दर्द को आपने शब्दों में पिरो दिया ....आहा सर क्या कहूँ ....कितना मर्म है आपकी रचना में ....दिल को छु गयी...मन का कोई कोना फिर से हरकत में आ गया .... बहुत बहुत बधाई आपको .... आपकी लेखनी को नमन ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 12, 2014 at 11:07am

ऐ ग़ज़ल तेरे बरखे से लहू टपक रहा है कहीं से चोट खाकर आई है शायद ....अपनी किसी रचना की पंक्तियाँ बरबस याद आ गई आपकी ये रचना पढ़कर शब्द-शब्द मानो दर्द से कराह  रहे हैं दिल को छू गई रचना |बधाई आपको आ० विजय निकोर जी |

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