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"क्या बात है, आपने कुर्बानी क्यों नहीं दी इस बार ? "
"दरअसल क़ुरआन मजीद फिर से पढ़ ली थी मैंने |"

.

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 21, 2017 at 10:03pm

बहुत सुंदर आदरणीय विनय सर |

Comment by विनय कुमार on October 21, 2014 at 9:29pm

आभार अलोक मित्तल जी..

Comment by Alok Mittal on October 21, 2014 at 11:46am

बहुत सुंदर ....विनय जी

Comment by विनय कुमार on October 12, 2014 at 10:54pm

आभार नीलेसजी..

Comment by Neeles Sharma on October 12, 2014 at 11:52am
बहुत उम्दा ! विनय जी
Comment by विनय कुमार on October 10, 2014 at 8:24pm

बहुत बहुत आभार शुभ्रांशु जी..

Comment by Shubhranshu Pandey on October 9, 2014 at 10:15pm

निदा साहब का एक शेर याद आ गया....................किसी रोते हुये बच्चे को हसाया जाये..

वाह सुन्दर आ. विनय जी.

सादर.

Comment by विनय कुमार on October 9, 2014 at 5:23pm

आभार आपका आदरणीय गणेश जी बागी जी..


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 9, 2014 at 4:25pm

जिस बात को कहने के लिए किताब छापने की जरुरत हो उसे आप दो पक्तियों में कह दी है आदरणीय विनय जी, सच में बहुत ही अच्छी लघुकथा बन सकी है, बहुत बहुत बधाई। 

Comment by विनय कुमार on October 8, 2014 at 10:03pm

आभार आपका जितेंद्रजी..

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