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धूप 


 

जिधर देखो आज
धुन्धलाइ सी है धूप. 

 

न जाने आज क्यों?
कुम्हलाई सी है धूप. 

 

आसमाँ के बादलों से
भरमाई सी है धूप. 

 

पखेरूओं की चहचाहट से
क्यों बौराई सी है धूप? 

 

पेड़ों की छाँव तले
क्यों अलसाई सी है धूप? 

चैत के माह में भी
बेहद तमतामाई सी है धूप. 

 

हवाओं की कश्ती पर सवार
क्यों आज लरज़ाई सी है धूप?

"मौलिक व अप्रकाशित"वीणा सेठी.

Views: 625

Comment

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Comment by Shyam Narain Verma on July 28, 2014 at 1:12pm
सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई सादर.................
Comment by vijay nikore on July 27, 2014 at 5:04pm

बहुत मार्मिक भाव हैं। बधाई।

Comment by Priyanka singh on July 26, 2014 at 8:20pm

अच्छी लगी आपकी धूप .... सुन्दर रचना ...बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 26, 2014 at 2:04pm

प्रस्तुति की कोमलता प्रभावित करती है, आदरणीया..

हार्दिक शुभकामनाएँ

Comment by savitamishra on July 25, 2014 at 10:00pm

सुंदर रचना

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 25, 2014 at 11:04am

महनीया

सुन्दर सतरंगी है धूप  !

Comment by kalpna mishra bajpai on July 24, 2014 at 9:05pm

आदरणीया सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 24, 2014 at 8:15pm

//पखेरूओं की चहचाहट से 
बौराई सी है धूप? 

 

पेड़ों की छाँव तले 
अलसाई सी है धूप? 

चैत माह में भी 
तमतामाई सी है धूप. 

 

हवाओं की कश्ती पर
लरज़ाई सी है धूप?//

कविता अच्छी लगी, बहुत बहुत बधाई आदरणीया वीणा सेठी जी। 

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