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Veena Sethi
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Veena Sethi replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"मर्यादा -वह पन्नी बिननेवाली उसका का रोज का काम सुबह उठकर पोलिथिन की थैलिया और पन्नी बीनना था. वह सालो से यह काम कर रही थी, शायद ही कभी उसने सुबह उठकर कुल्ला या मंजन किया हो, उसे खुद भी याद नहीं होगा. वह सीधे किसी भी होटेल में जाती और वही चाय के घूँट…"
May 30

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Female
City State
Bhopal, Madhya Pradesh
Native Place
Bhopal
Profession
Creative Fashion Designer

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जीवन

जीवन

तुम हो 

 एक अबूझ पहेली,

न जाने फिर भी

क्यों लगता है

तुम्हे बूझ ही लूंगी.

पर जितना तुम्हें

हल करने की

कोशिश करती हूँ,

उतना ही तुम

उलझा देते हो.

थका देते हो.

पर मैंने भी ठाना है;

जितना तुम उलझाओगे ,

उतना तुम्हें

हल करने में;

मुझे आनन्द आएगा.

और

इसी तरह देखना;

एक दिन

तुम मेरे

हो जाओगे.…

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Posted on December 18, 2017 at 8:30pm — 5 Comments

सम्मान की एक जिंदगी.लघु कथा

जब से पता चला है कि रत्ना एक समय धन्धा करती थी, तब से पूरे समूह की दूसरी औरतों के चेहरे पर उसके प्रति नपंसदगी और तनाव साफ देखा जा सकता है. पर किसी में हिम्मत नहीं थी कि उसका विरोध कर सके क्योंकि सबको दीदी का डर सता रहा था. मै ये बात एक स्वयं सहायता समूह “उदया” की कर रही हूँ जो हस्तशिल्प का काम एक एन.जी.ओ. के लिए करता है, जिसे विभा दीदी संचालित करती हैं. समूह की अध्यक्षा सरला से जब रहा नहीं गया तो उसने सबसे सलाह कर दीदी से बात करने की ठानी.

आज जब विभा आई तो उसने सबके बीच पसरे…

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Posted on June 6, 2015 at 2:00pm — 7 Comments

धूप -कविता

धूप 



 

जिधर देखो आज

धुन्धलाइ सी है धूप. 

 

न जाने आज क्यों?

कुम्हलाई सी है धूप. 

 

आसमाँ के बादलों से

भरमाई सी है धूप. 

 

पखेरूओं की चहचाहट से

क्यों बौराई सी है धूप? 

 

पेड़ों की छाँव तले

क्यों अलसाई सी है धूप? 

चैत के माह में भी

बेहद तमतामाई सी है धूप. 

 

हवाओं की कश्ती पर सवार

क्यों आज लरज़ाई सी है धूप?

"मौलिक व…

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Posted on July 24, 2014 at 5:30pm — 8 Comments

आत्म विश्लेषण क्यों न करे एक बार..........

कहते हैं की इन्सान दुनिया से मुँह चुरा सकता है पर स्वयं से नहीं। जब भी हम कुछ करते हैं अच्छा या बुरा हम स्वयं ही उसके गवाह और न्यायाधीश होते हैं, अगर अच्छा करते हैं तो खुद को शाबासी देते हैं और बुरा करते हैं तो स्वयं को कटघरे में खड़ा कर देते हैं,क्योंकि हम खुद के प्रति उत्तरदायी होते हैं पर ये सारी क्रिया हम दुनिया के सामने करने का साहस  कर सकते हैं … ??? नहीं … ना …!! क्योंकि हम दुनिया से मुँह चुरा रहे होते हैं। हमारे  कार्य जीवन के प्रति हमारे नजरिये से जुड़े होते हैं। हम क्या अच्छा करते…

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Posted on December 27, 2013 at 5:30pm — 4 Comments

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At 8:37am on February 24, 2014, Vindu Babu said…

At 8:37am on February 24, 2014, Vindu Babu said…

आपका हार्दिक स्वागत करती हूँ आदरणीया वीणा जी।
सादर

At 4:39pm on July 9, 2012, अरुन 'अनन्त' said…

आपका तहे दिल से स्वागत है वीना जी.

At 8:15pm on May 14, 2012, SANDEEP KUMAR PATEL said…

आपका स्वागत है .............वीणा जी ..............आभारी हुँ

At 8:20am on May 13, 2012, Bhawesh Rajpal said…

Respected Veena ji , I am pleased to accept your offer of friendship , and greatful to you.

Thaks and Regards .

    -  Bhawesh Rajpal.(rajpal.bhawesh@yahoo.com )

At 8:13pm on May 11, 2012, Bhawesh Rajpal said…
वीणा सेठी जी आपका हार्दिक स्वागत  ! 
 
 
 

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