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चुभें ये अगर साफ़ बातें मेरी (ग़ज़ल 'राज')

१२२  १२२  १२२  १२

 

जहाँ  गलतियाँ हों बता दें मेरी

चुभें  ये  अगर साफ़ बातें मेरी

 

तुम्हें जिन्दगी दी तो हक़ भी मिला

तुम्हारे कदम पे निगाहें  मेरी

 

हर इक मोड़ पर तुम मुझे पाओगे

नहीं हैं जुदा तुमसे राहें  मेरी

 

तुम्हें नींद आती नहीं है अगर

कहाँ फिर कटेंगी ये रातें मेरी

 

छुपा क्या सकोगे जबीं की शिकन

हमेशा पढ़ेंगी ये आँखें मेरी

 

तुम्हारी हिफ़ाज़त करूँ जब तलक

चलेंगी तभी तक ये साँसें मेरी

 

नहीं आज तुम कुछ समझ पाओगे 

समझ जाओगे कल ये बातें मेरी

 

नसीहत लगें आज तुमको फ़कत

समझना इन्हें कल दुआएँ मेरी

-------------------------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 24, 2014 at 1:12pm

तुम्हें नींद आती नहीं है अगर

कहाँ फिर कटेंगी ये रातें मेरी .. .

इस शेर के आलोक में मैं आपकी इस ग़ज़ल को देख गया, आदरणीया राजेश कुमारीजी. 

यों, मैं भी ग़ज़ल को सब्जेक्टिव विधा नहीं मानता. ग़ज़लियत ग़ज़ल का प्राण है. इसी के कारण ग़ज़ल प्रभावी और प्रचलित है. उस हिसाब से आपकी इस ग़ज़ल के शेर निर्पेक्ष लगे हैं.  शेरों को इसी कारण इन्हें दाद मिलनी चाहिये.

दिल से बधाई.. .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 24, 2014 at 12:06pm

आ० डॉ गोपाल नारायण जी ,ग़ज़ल की नब्ज आपने पकड़ी है ,आपकी पारखी नज़र को सलाम/ नमन सच कहा इस ग़ज़ल में एक माँ के अपने बच्चों के प्रति होने वाली चिंता , फ़िक्र तथा प्रेक्षण को ही शब्दों में बांधा है मैंने,आपको ग़ज़ल पसंद आई तहे दिल से शुक्रिया सादर.  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 24, 2014 at 12:01pm

जितेन्द्र गीत भैय्या ,आपको ग़ज़ल पसंद आई उसके अन्दर के दर्द को आप महसूस कर सके मानो मेरी ग़ज़ल सार्थक हुई ,तहे दिल से आभार आपका |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 24, 2014 at 11:21am

महनीया

यह तो माँ के दिल  की आवाज  लगती है  i बेहद भावपूर्ण i बेटे को नसीहत भी देती हुयी i उसकी परीक्षा भी लेती हुयी i  और यह शाश्वत सत्य  भी कि -

नहीं आज तुमको समझ आएगा

समझ जाओगे कल ये बातें मेरी

 नसीहत लगें आज तुमको फ़कत

समझना इन्हें कल दुआएँ मेरी

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 24, 2014 at 11:16am

बहुत खुबसूरत गजल,आदरणीया राजेश दीदी. दिल में उठती पीर को बहुत खूबसूरत और धीमे-धीमे स्वर  से बह्र में बाँध दिया आपने. दिली बधाईयाँ आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 24, 2014 at 9:42am

आ० डॉ विजय शंकर जी,ग़ज़ल आपको पसंद आई तहे दिल से आभार सादर . 

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 23, 2014 at 10:54pm
नसीहत लगें आज तुमको फ़कत
समझना इन्हें कल दुआएँ मेरी
बहुत सुन्दर आदरणीय राजेश कुमारी जी , बधाई .

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