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" क्या बात है वर्माजी , बड़े खुश नज़र आ रहे हैं आप , कोई लाटरी तो नहीं लग गयी इस उम्र में" |
" नहीं भाई , दरअसल अख़बार में खबर थी कि एक वृद्धाश्रम बन रहा है अपने शहर में , अब कम से कम बाक़ी जिंदगी तो अपनों में गुजरेगी "|

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on July 21, 2014 at 9:41pm

आभार सौरभजी..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 21, 2014 at 3:05am

आज के दौर के एक महत्त्वपूर्ण विन्दु को साझा करती लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय.

Comment by विनय कुमार on July 12, 2014 at 4:21pm

आभार डॉ गोपाल जी |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 12, 2014 at 10:51am

बहुत सुन्दर

खासकर --- बाकी जिन्दगी तो अपनों में गुजरेगी i

Comment by Shubhranshu Pandey on July 11, 2014 at 8:19pm

आदरणीय विनय जी,

सुन्दर कथा.

वर्मा जी की खुशी के पीछे की हालत और हालात को सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है.

बेगाने अब अपनों से ज्यादा अपने लग रहे हैं..कथा में वर्मा जी को एक विश्वास भी है कि उनके जैसे और लोग भी उस वृद्धाश्रम में उनके साथ होंगे...इसने समाज के एक विद्रुप रुप को भी सामने रखा है...बधाई..

सादर.

Comment by विनय कुमार on July 11, 2014 at 8:18pm

बहुत बहुत आभार कि अपने सराहा राजेश जी | 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 11, 2014 at 8:05pm

जब अपने संवेदन हीन हैं तो जो अपने जैसे हैं वही अपने हैं आजकल ....बहुत बढ़िया सार्थक लघु कथा अपना सन्देश देने में सफल है 

बहुत- बहुत बधाई विनय कुमार जी |

Comment by विनय कुमार on July 11, 2014 at 12:16pm

बहुत बहुत आभार शिज्जु जी एवम जीतेन्द्र जी |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 11, 2014 at 10:11am

वाकई आज की औलादों में संवेदनहीनता बढ़ती जा रही है बहुत बहुत बधाई इस लघुकथा के लिये

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 11, 2014 at 10:07am

लाटरी ही तो लग रही है, वरना आज का इंसान, इंसान नही रहा  आम हो गया है. :)) ...जब तक वो  कुछ दे सके या पा सको अपना , फिर .......बहुत अच्छी लघुकथाएं पढने को मिल रही है आदरणीय विनय जी आपकी कलम से . आपको बहुत बहुत बधाई

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