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ग़ज़ल : सदा संदेह से बरसों का बंधन टूट जाता है

बह्र : हज़ज़ मुसम्मन सालिम

मुलायम फूल सा हो दिल या दरपन टूट जाता है,
सदा संदेह से बरसों का बंधन टूट जाता है,

जमीं जब रार बोती है सगे दो भाइयों में तो,
मधुर संबंध आपस का पुरातन टूट जाता है,

तुम्हारी याद में मैया मैं जब आंसू बहाता हूँ,
दिवारें सील जाती हैं कि आँगन टूट जाता है,

पृथक प्रारब्ध ने हमको किया है जानता हूँ पर,
विरह की वेदना में जूझके मन टूट जाता है,

भले अभिमान करती हों स्वयं पे खूब बरसातें,

झड़ी नैनों की लगती है तो सावन टूट जाता है,

समस्याओं से होता है नहीं विचलित कभी लेकिन,
क्षुधा औ प्यास बढ़ती है तो निर्धन टूट जाता है,

खड़ा रणक्षेत्र में बेहद भले हो शत्रु बलशाली,
समझदारी व साहस हो तो दुश्मन टूट जाता है.

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by शिज्जु "शकूर" on July 8, 2014 at 10:36pm

बहुत बढ़िया आदरणीय अरुण भाई शानदार ग़ज़ल है हरेक शेर लाजवाब है बहुत बहुत बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 8, 2014 at 11:29am

जमीं जब रार बोती है सगे दो भाइयों में तो,
मधुर संबंध आपस का पुरातन टूट जाता है,----सोलह आने सच 

भले अभिमान करती हों स्वयं पे खूब बरसातें,

झड़ी नैनों की लगती है तो सावन टूट जाता है,------वाह्ह्ह वाह्ह्ह आँसुओं की झड़ी और बरसात का बिम्ब सुभानल्लाह 

समस्याओं से होता है नहीं विचलित कभी लेकिन, 
क्षुधा औ प्यास बढ़ती है तो निर्धन टूट जाता है,------सच कहा भूख प्यास की मार तोड़ेगी नहीं तो क्या करेगा एक गरीब .....जबरदस्त कहन

बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल कही है प्रिय अरुन  ,,,दिली दाद कबूलिये 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 8, 2014 at 11:21am

अरुण जी ....आपकी यह ग़ज़ल भी खूब भाई ..

मुलायम फूल सा हो दिल या दरपन टूट जाता है,
सदा संदेह से बरसों का बंधन टूट जाता है,......संदेह किसी को नहीं बख्सता .बिलकुल सही 

जमीं जब रार बोती है सगे दो भाइयों में तो,
मधुर संबंध आपस का पुरातन टूट जाता है,..................घर घर गवाह है इन पंक्तियों का 

तुम्हारी याद में मैया मैं जब आंसू बहाता हूँ,
दिवारें सील जाती हैं कि आँगन टूट जाता है,.............माँ का तो कोई विकल्प ही नहीं ...आँगन टूट जाता है .थोडा दुबिधा में हूँ 

पृथक प्रारब्ध ने हमको किया है जानता हूँ पर,
विरह की वेदना में जूझके मन टूट जाता है,....................यहीं तो सब विवश है 
...

भले अभिमान करती हों स्वयं पे खूब बरसातें,

झड़ी नैनों की लगती है तो सावन टूट जाता है,

समस्याओं से होता है नहीं विचलित कभी लेकिन, 
क्षुधा औ प्यास बढ़ती है तो निर्धन टूट जाता है,.....यहाँ मैं भी नीलेश जी से सहमत हूँ

खड़ा रणक्षेत्र में बेहद भले हो शत्रु बलशाली,
समझदारी व साहस हो तो दुश्मन टूट जाता है....बिलकुल सही 

आपकी ग़ज़ल में हिंदी का जबरदस्त प्रयोग आपकी ग़ज़लों के सबसे अलहदा रखता है ..ढेरों बधाई के साथ 

Comment by वेदिका on July 8, 2014 at 9:33am

वाह! वाह! बेहद सुन्दर गजल हुयी है आ० अनंत जी!

तुम्हारी याद में मैया मैं जब आंसू बहाता हूँ,
दिवारें सील जाती हैं कि आँगन टूट जाता है, ....... /आँगन का टूटना/ मुझे यह समझ नही आया| मार्गदर्शन दीजिये 

खड़ा रणक्षेत्र में बेहद भले हो शत्रु बलशाली,
समझदारी व साहस हो तो दुश्मन टूट जाता है ...लाजवाब शेअर हुआ है| 

बेहतरीन हिंदी गजल के लिए अनंत शुभकामनाएं आदरणीय अनंत जी!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on July 8, 2014 at 9:26am

वाह, वाह, वाह  आदरणीय अरुण अनंत जी,

विचारों की परिपक्वता हर अश'आर में परिलक्षित हो रही है. रूह से निकली पंक्तियों को नमन.......

पृथक प्रारब्ध ने हमको किया है जानता हूँ पर,
विरह की वेदना में जूझके मन टूट जाता है,

Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 8, 2014 at 9:03am

बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई है ..बधाई .
क्षुधा औ प्यास ..पर्यायवाची हैं सो एक साथ होना थोडा अखर रहा है ..
इस शेर के लिए विशेष बधाई ..

भले अभिमान करती हों स्वयं पे खूब बरसातें,

झड़ी नैनों की लगती है तो सावन टूट जाता है,


सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 7, 2014 at 6:30pm

बहुत सुन्दर अरुण जी i

 

भले अभिमान करती हों स्वयं पे खूब बरसातें,

झड़ी नैनों की लगती है तो सावन टूट जाता

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