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एक बाजू गर्वीला पर्वत

अपनी ऊँचाई और धवलता पर इतराता

क्यूँ देखेगा मेरी ओर?

गर्दन  झुकाना तो उसकी तौहीन है न!   

दूजी बाजू छिः !! यह तुच्छ बदसूरत बदरंग शिलाखंड  

मैं क्यूँ देखूँ इसकी ओर

कितना छोटा है ये 

इसकी मेरी क्या बराबरी 

समक्ष,परोक्ष ये ईर्ष्यालू भीड़ ,उफ्फ!!

जब सबकी अपनी-अपनी अहम् की लड़ाई

और मध्य में वर्गीकरण की खाई

फिर क्यूँ शिकायत

अकेलेपन से!! 

अपने दायरे में

संतुष्ट क्यों नहीं ?

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 10, 2014 at 10:07am

आ० सौरभ जी ,आपको रचना पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ ,हार्दिक आभार आपका |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 10, 2014 at 12:37am

एक बहुत ही सार्थक कविता के लिए हार्दिक बधाई लीजिये आदरणीया.. .

शुभ-शुभ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 5, 2014 at 7:06pm

आ० गिरिराज भंडारी जी रचना के अनुमोदन हेतु मेरा उत्साह वर्धन करती प्रतिक्रिया हेतु आपका बहुत- बहुत आभार |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 5, 2014 at 7:27am

आदरणीया राजेश जी , दुनिया की हर लड़ाई अहं से ही शुरू  होती है , यही तो हर फसाद की जड़ है , यही तो मनुष्य को असल मायने मे मनुष्य होने नही दे रहा है । बहुत सार्थक अभिव्यक्ति के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 4, 2014 at 7:49pm

सविता मिश्रा जी ,आपको रचना पसंद आई बहुत- बहुत शुक्रिया|


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 4, 2014 at 7:48pm

आ० लक्ष्मण धामी भैय्या,ये कमजोरी कभी न कभी हरेक को शिकार बनाती है बस इससे बचना ही चाहिए| कैसे इसका उत्तर भी आपको अपने अन्दर से ही मिलेगा ,रचना के अनुमोदन हेतु बहुत-बहुत आभार |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 4, 2014 at 7:46pm

आ० डॉ गोपाल जी, आपने रचना का अनुमोदन करके मेरी रचना और मेरी कलम दोनों को धन्य किया है ह्रदय तल से आभारी हूँ |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 4, 2014 at 7:44pm

जितेन्द्र गीत भैय्या अहम् एक एसा रोग है जो मानव के सर्वांगीण विकास में बाधक होता है उसका सोचने का दायरा घाट जाता है उसके इर्द गिर्द एक ऐसी परिधि बन जाती है जो फिर उसे बाहर नहीं निकलने देती अतः जितना हो सके इस रोग को अपने से दूर रखना है ,आपको इस रचना का मर्म प्रभावित कर सका मेरा लिखना सार्थक हुआ ,ह्रदय से आभारी हूँ और हाँ मैं अतुकांत इतना लिख चुकी हूँ कि अब मुझे विषय ढूँढना पड़ता है ओबिओ पर ही मेरे ब्लॉग में बहुत सारी मिल जायेंगी|

Comment by savitamishra on July 4, 2014 at 7:15pm

बहुत सुन्दर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 4, 2014 at 12:08pm

आ० राजेश दीदी , कभी कभी मुझ पर भी अहम सवार हो जाता है l इसे उतरने का कोई सरल उपाय हो तो मुझे भी बताएं . इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई l

कृपया ध्यान दे...

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