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स्वप्न

पावस-अमावस में, निविड़ में बीहड़ में

साहस की मूर्ति बनी कृष्ण अभिसारिका  I

नीर नेत्र-नीरज में धर्म वृत्ति धीरज में

श्रृद्धा भक्ति भाव भरी आयी सुकुमारिका I

देखा प्रिय पंथ में खड़े है अड़े भासमान

धाय गिरी अंक मे अधीर हुयी चारिका  I

चौंकि उठी उसी क्षण स्वप्न सुख भंग हुआ

हाय ! कहाँ कान्ह वे तो जाय बसे द्वारिका I  

 

मुक्ति-चतुष्टय

(भारतीय दर्शन में चार प्रकार की मुक्ति मानी गयी है -

सामीप्य, सारूप्य, सालोक्य, सायुज्य )

 

वैभव समाज छोड़, लोक रीति लाज छोड़

चली  काम-काज छोड़ अभिसार करने I

कुञ्ज की उजाली देख प्रीतम प्रभाली देख

लगी रोष -लाली देख मनुहार करने I

प्रेयसि का चन्द्र -मुख, प्रिय का सनेह सुख

क्या ही रस वाद लगा झार-झार झरने I

स्वामि ने स्वरुप दिया लोक अपरूप दिया

सुखद  सामीप्य दिया, सामरस्य सरने I

 

 

[अप्रकाशित एवं मौलिक ]

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 4, 2014 at 10:41am

महनीया मंजरी जी

आपका हार्दिक आभार i

Comment by mrs manjari pandey on July 3, 2014 at 8:50pm
आदरणीय गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी बहुत ही मनमोहक रचना।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 2, 2014 at 3:12pm

आदरणीय ब्रिजेश जी/ आपसे प्रोत्साहन पाना एक पुरस्कार है i / सादर i

Comment by बृजेश नीरज on July 2, 2014 at 2:38pm
वाह। बहुत सुन्दर। आपको हार्दिक बधाई।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 2, 2014 at 2:33pm

शिज्जू  भाई / आप जैसे श्रेष्ठ कलमकार से मान पाना अहोभाग्य है i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 2, 2014 at 2:32pm

आदरणीय शर्मा जी / आपके स्नेह से आप्यायित हुआ i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 2, 2014 at 2:29pm

सविता मिश्रा जी / आपके प्रोत्साहन का आभार i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 2, 2014 at 2:29pm

मीना जी /आपका आभार  i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 2, 2014 at 8:45am

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण सर बहुत खूबसूरत रचनायें हैं बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 1, 2014 at 9:29pm

श्रृद्धा भक्ति भाव भरी आयी सुकुमारिका---

स्वप्न में भी यह भाव , अद्भुत है.बधाई आदरणीय

कृपया ध्यान दे...

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