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नवगीत--झील चुप सी.......!

झील चुप सी राह तकती,
नाव डगमग
भाव भर कर
राज सारे पूछती है।

रेत फिसली
तट सॅवर कर,
हाथ पल पल
धो रही नित,
मल घुला जल
विष भरे तन
मीन प्यासी कोसती है।।1


सूर्य किरनों से
पिए नित रक्त
नदियों के बदन का,
धर्म की
पतवार भी अब
तीर सम तन छेदती है।।2


वन-सरोवर
तन उचट कर
छॉंव गिर कर
दूर जाती।
प्रेम का
सम्बन्ध रचकर
सांझ तक मन सोखती हैं।।3


रात सज कर
जब मचलती,
दौर पर तब
दौर चलते
घूस-बलवा
तेल पीकर,
दीप की लौ झूमती है।।4


सिर चढ़ी मय
जिद करे अब
मन उमंगे
वाह! करती
नाचते दंगें
उछल कर
आह! भरती चॉंदनी है।5

के0पी0सत्यम-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 1, 2014 at 9:51am

आ0 कुन्ती दी'जी, नवगीत पर मुक्तकण्ठ से सराहना एवं उत्साहवर्धन के लिए आपको सादर प्रणाम सहित आपका बहुत-बहुत हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 1, 2014 at 9:46am

आ0 विजय सर जी, नवगीत पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 1, 2014 at 9:43am

आ0 अरून भाई जी, नवगीत पर मुक्तकण्ठ से सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by Neeraj Neer on April 1, 2014 at 9:28am

बहुत सुन्दर भाव से युक्त नवगीत. 

Comment by coontee mukerji on March 31, 2014 at 5:00pm

बहुत सुंदर ढंग से आपने समाज की कुछ कुरीतियों अपने नवगीत में ढाला  है. केवल जी आपकी लेखन प्रतिभा सराहनीय है.

Comment by vijay nikore on March 31, 2014 at 11:38am

अच्छे भाव  पिरोय हैं। बधाई।

Comment by Arun Sri on March 31, 2014 at 11:29am

प्रकृति और समाज की सुंदरता को असुंदर होते महसूस किया पढकर ! अनियंत्रित मानवीय व्यव्हार , अवसरवादिता और कुरीतियों पर एक साथ बात करती रचना ! सुन्दर !

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