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2122/ 2122/ 2122/ 212

कातिलों के शह्र में अहले जिगर आते नहीं

भीड़ से होकर परे चहरे नज़र आते नहीं

 

मेरे चारों ओर किस्मत ने बना दी बाड़ सी

हाल ये है अब परिन्दे तक इधर आते नहीं

 

वक्त सा होने लगा है दोस्तों का अब मिजाज़

गर चले जायें तो वापस लौटकर आते नहीं

 

ज़ीस्त के कुछ रास्तों पे तन्हा चलना ठीक है

क्यूँकि अक्सर साथ अपने राहबर आते नहीं

 

नक्शे-माज़ी देखने को आते तो हैं रोज़-रोज़

खण्डहर में लोग रहने को मगर आते नही

 

कामयाबी की लिखी जाये जहाँ से दास्ताँ

याद लोगों को पुराने वो नगर आते नहीं

 

-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by शिज्जु "शकूर" on March 11, 2014 at 9:50am

आदरणीय बृजेशजी रचना की सराहना के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 11, 2014 at 9:49am

आदरणीय अखिलेश सर आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 11, 2014 at 9:49am

आदरणीय श्यामनारायणजी आपका आभार

Comment by Meena Pathak on March 11, 2014 at 9:40am
Bahut bahut khoob ... Dhero badhai .. Saadar
Comment by vandana on March 11, 2014 at 5:34am

कामयाबी की लिखी जाये जहाँ से दास्ताँ

याद लोगों को पुराने वो नगर आते नहीं

वाह बेहतरीन ग़ज़ल आदरणीय शिज्जु जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 10, 2014 at 9:18pm

आदरणीय शिज्जू भाई , बहुत खूब सूरत ग़ज़ल कही है , आपको ढेरों बधाइयाँ ॥

वक्त सा होने लगा है दोस्तों का अब मिजाज़

गर चले जायें तो वापस लौटकर आते नहीं

 

ज़ीस्त के कुछ रास्तों पे तन्हा चलना ठीक है

क्यूँकि अक्सर साथ अपने राहबर आते नहीं ---- लाजवाब , भाई शिज्जू , बहुत बधाइयाँ ॥

Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on March 10, 2014 at 8:51pm

ज़ीस्त के कुछ रास्तों पे तन्हा चलना ठीक है

क्यूँकि अक्सर साथ अपने राहबर आते नहीं...क्या बात है..क्या बात है..बधाई हो आदरणीय 

Comment by बृजेश नीरज on March 10, 2014 at 7:18pm

वाह बहुत खूब! आपको बहुत-बहुत बधाई इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए!

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on March 10, 2014 at 6:53pm

वक्त सा होने लगा है दोस्तों का अब मिजाज़

गर चले जायें तो वापस लौटकर आते नहीं

अच्छी गज़ल हुई शिज्जु भाई, हार्दिक बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on March 10, 2014 at 10:56am
अच्छी ग़ज़ल की हार्दिक बधाई ।

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