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कहीं चाँद छुप के निकल रहा ( ग़ज़ल ) गिरिराज भंडारी

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ये न पूछ शाम ढली किधर , तू ये देख चाँद निकल रहा

समाँ सुर्मयी था जो रात का , वो भी चंपई मे बदल रहा

***

ये तो हौसले की ही बात है ,बड़ी तेज धूप है चार सूँ

किसी सायबाँ का पता नही ,बिना आसरा कोई चल रहा

***

मै क़दम मिला के न चल सका, ऐ जहाने नौ तेरी चाल से

मेरी कोशिशें हुई रायगाँ, मै क़दम क़दम पे फिसल रहा

***
रायगाँ = व्यर्थ

तेरा मुस्कुराना ग़ज़ब किया, तुझे क्या कहूँ मेरी हमनफ़स

वो जो मर चुका मेरा ख़्वाब था ,मेरी आखों में वो मचल रहा  

***

हमनफ़स = साथी , मित्र 

ये विचित्रता भी तो देखिये , कि झुकी है डाली फलों लदी

कहीं घट भरा हुआ मौन है , जो अधूरा है वो उछल रहा

***

यहाँ जाविदाँ भला कौन है, कभी थे यहाँ, वो  नही  रहे  

न वो बादशाह न फ़र्द है, न वो आज है न वो कल रहा

***
जाविदाँ = अमर ,

ये जो बदलियाँ बिना ख़ौफ़ के, लगीं घूमने सरे आसमाँ

यहाँ चाँदनी है डरी हुई , कहीं चाँद छुप के निकल रहा

****

न ही दर्या है न ये बह्र है , न ये कोई झील है गर्म सी

ये तो दर्द का वो पहाड़ है , जो है आंच पाके पिघल रहा

 

****************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 6, 2014 at 8:45pm

आदरणीय केवल भाई , ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 6, 2014 at 8:18pm

आ0 भण्डारी भाई जी,  ///

ये विचित्रता भी तो देखिये , कि झुकी है डाली फलों लदी

कहीं घट भरा हुआ मौन है , जो अधूरा है वो उछल रहा//......क्या बात है...! सुन्दर गजल।  हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 6, 2014 at 6:15pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , स्नेहिल सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 6, 2014 at 6:07pm

आदरणीय भाई गिरिराज जी ,किस शे'र कि प्रशंसा करूं और किसे छोड़ दूं ........


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 6, 2014 at 5:37pm

आदरणीय मनोज भाई , ग़ज़ल की सरहना कर, उत्साह वर्धन करने केलिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥

Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on March 5, 2014 at 9:31pm

लाजबाव गिरिराज सर...क्या कहने हैं..गजब की मुसम्मन गजल है..आपकी मुकम्मल गजल तो लाजबाब है ही..विशेषकर दो शेर तो निहायत ही खूबसूरत हैं..

मै क़दम मिला के न चल सका, ऐ जहाने नौ तेरी चाल से

मेरी कोशिशें हुई रायगाँ, मै क़दम क़दम पे फिसल रहा....और 

न ही दर्या है न ये बह्र है , न ये कोई झील है गर्म सी

ये तो दर्द का वो पहाड़ है , जो है आंच पाके पिघल रहा...बधाई हो 

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