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दोहा-----------बसन्त

आम्र वृक्ष की डाल पर, कोयल छेड़े तान।
कूक कूक कर कूकती, बन बसंत की शान।।1

वन उपवन हर बाग में, तितली रंग विधान।
चंचल मन उदगार है, प्रीति-रीति परिधान।।2

क्षितिज प्रेम की नींव है, कमल भवन, अलि जान।
दिन भर गुन गुन गान है, सांझ  ढले  रस  पान।।3

मन मन्दिर है प्रेम का,  जिसमें  रहते   संत।
विविध रंग अनुबंध में, खिल कर बनों बसंत।।4

पुरवार्इ मन रास है,  सकल  बहार  उजास।
किरनें जल से खेलती, मस्ती में मधुमास।।5

फूल-शूल के सम रहो, प्रेम  परक  व्यवहार।
कठिन समय में साथ रह, करें रक्ष उपकार।।6

धर्म ज्ञान संस्कार हो, समय शील  संज्ञान।
क्षेत्र रीति से प्रीत पर, पहन सरल परिधान।।7

के0पी0 सत्यम मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 4, 2014 at 12:44am

आम्र वृक्ष की डाल पर, कोयल छेड़े तान।
कूक कूक कर कूकती, बन बसंत की शान।।1....  
कूक-कूक कर कूकती .. का क्या मतलब ? कोयल कूकने के क्रम में कुछ और स्वर निकालती है क्या ? यदि हाँ, तो वह कूकना कत्तई नहीं कहलायेगा.

मन मन्दिर है प्रेम का,  जिसमें  रहते   संत।
विविध रंग अनुबंध में, खिल कर बनों बसंत।।4
तुकान्तता की दृष्टि से यह दोहा कमज़ोर है. संत दोनों पदों में है. लेकिन पहले पद में संत के पहले ते आया है तो दूसरे पद में ब आया है. देख लें.

धर्म ज्ञान संस्कार हो, समय शील  संज्ञान।
क्षेत्र रीति से प्रीत पर, पहन सरल परिधान।।7
क्षेत्र रीति से प्रीत पर... इसके क्या अर्थ हुए ? वैसे, जो प्रतीत हो रहा है, आप यह कहना चाहते हैं कि हर क्षेत्र की अपनी रीति होती है उसी के अनुसार परिधान पहनना चाहिए. किन्तु यह छंद में स्पष्ट नहीं हो रहा है.

बाकी के दोहों समुचित हैं.
शुभेच्छाएँ
 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 12, 2014 at 7:26pm

आ0 शिज्जू भार्इ आपका बहुत-बहुत हार्दिक आभार।  सादर,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 11, 2014 at 7:27pm

आदरणीय केवलजी बहुत अच्छी दोहावली हुई है बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें
सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 11, 2014 at 6:35pm

आ0 राम शिरोमणि भार्इ जी  , अरून अनन्त भार्इ जी , नीरज भार्इ जी , भण्डारी भार्इ जी एवं आदरणीया कुन्ती मुखर्जी जी आप सभी का हार्दिक आभार। सादर,

Comment by Neeraj Neer on February 11, 2014 at 9:18am

बहुत सुन्दर दोहे 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 10, 2014 at 6:11pm

आदरणीय केवल भाई , सभी दोहे लाजवाब रचे हैं , बहुत बहुत बधाई ॥

Comment by coontee mukerji on February 10, 2014 at 3:54pm

केवल भाई आपके दोहे ने मन मुग्ध कर दिया बहुत  बहुत शुभकामनएँ

Comment by अरुन 'अनन्त' on February 10, 2014 at 1:21pm

आदरणीय केवल भाई जी सभी दोहे बहुत ही सुन्दर रचे हैं आपने आपको बहुत बहुत बधाई.

Comment by ram shiromani pathak on February 10, 2014 at 10:21am

बहुत ही सुन्दर दोहे रचे है आपने आदरणीय भाई  केवल जी  ....  बहुत बहुत बधाई आपको 

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