For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

(एक)

 

तुम क्या चुकाओगे

मेरी मेहनत की कीमत

मेरी जवानी

मेरे सपने

मेरी उम्मीदें

सब-कुछ तो दफ्न है

तुम्हारी इमारतों में।

 

(दो)

 

जब चलती हैं  

झुलसा देने वाली गर्म हवाएँ

कवच बन जातीं है

यही सूरज की किरणें

हमारे लिए ।

 

मुसलधार बारिश

जब हमारे बदन को छूती है

फिर से खिल उठता है  

हमारा तन

ऊर्जावान हो जाता है

जिस्म का रोम- रोम ।

 

हमारे पसीने की गंध

ला देती है गर्मी

पिघला देती है

कड़कड़ाती ठंड को ।

 

बदलता है मौसम

हमारे लिए

हम नहीं बदलते

मौसम के साथ ।

(मौलिक एवं अप्रकाशित) 

 

Views: 585

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by नादिर ख़ान on January 26, 2014 at 12:22pm

आदरणीया डॉ प्राची जी मार्गदर्शन के लिए आभार ...

बेहतर करने की कोशिश जारी है पर उस दिशा में ज़्यादा सफलता नहीं मिल पा रही है ।

कृपया इसी तरह मरदर्शन बनाये रखें ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 22, 2014 at 8:59pm

तुम क्या चुकाओगे

मेरी मेहनत की कीमत

मेरी जवानी

मेरे सपने

मेरी उम्मीदें

सब-कुछ तो दफ्न है

तुम्हारी इमारतों में।..................सार्थक सुन्दर क्षणिका 

बदलता है मौसम

हमारे लिए

हम नहीं बदलते

मौसम के साथ ..................वाह बहुत सुन्दर भाव 

फिर भी, दूसरी क्षणिका थोड़ी कथ्य सांद्रता की मांग करती सी लगी 

इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई आ० नादिर खान जी 

Comment by नादिर ख़ान on January 20, 2014 at 6:22pm

आदरणीय जितेंद्र जी,आदरणीय अखिलेश श्रीवास्तव जी,आदरणीय बृजेश जी एवं आदरणीय अरुण शर्मा जी, मेरे प्रयास को आप लोगों ने सराहा बहुत बहुत शुक्रिया | कोशिश सार्थक हुई ....

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 20, 2014 at 2:03pm

बहुत ही सुन्दर क्षणिकायें आदरणीय नादिर जी बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by बृजेश नीरज on January 20, 2014 at 12:07am

अच्छी क्षणिकाएँ हैं आदरणीय! आपको बहुत-बहुत बधाई!

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on January 19, 2014 at 5:31pm

आदरणीय नादिर भाई जी,

उच्च भाव , खूबसूरत शब्द संयोजन ,  पूरी रचना पर हार्दिक   बधाई स्वीकार करें ॥

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 19, 2014 at 9:49am

बदलता है मौसम

हमारे लिए

हम नहीं बदलते

मौसम के साथ ।.............आपकी लेखनी को नमन आदरणीय नादिर साहब

Comment by नादिर ख़ान on January 17, 2014 at 11:46pm

आदरणीया  अन्नपूर्णा जी हौसला अफजाई के लिए तहेदिल से शुक्रिया .........

Comment by नादिर ख़ान on January 17, 2014 at 10:32pm

आदरणीय गुमनाम जी आपका बहुत शुक्रिया .......

Comment by annapurna bajpai on January 17, 2014 at 10:28pm

आ0 नादिर भाई जी बधाई आपको इस सुंदर रचना के लिए । 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

दोहा पंचक. . . .संयोग शृंगारअभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही…See More
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Friday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service