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ग़ज़ल - बज़्म थी तारों की उसमें चाँद का पहरा भी था

२१२२      २१२२      २१२२     २१२

बज़्म थी तारों की उसमें चाँद का पहरा भी था

धूम थी रानाइयों की दिल मेरा तन्हा भी था

 

इक नदी थी नाव भी थी और था मौसम हसीं

साथ तुम थे बाग़ गुल थे इश्क मस्ताना भी था

 

यार की गलियों  गया मैं फिर से लेकर आरज़ू

कुछ पुराने ख्वाब थे हर सिम्त वीराना भी था

 

कैसे - कैसे लोग मिलते हैं यहाँ देखो सही

बात में चीनी घुली थी दिल मगर काला भी था

 

वो अज़ब ही दौर था हर बात पर हँसते थे हम

ये जहाँ  गोया लतीफ़ा मस्त बचकाना भी था

अमित दुबे

मौलिक व अप्रकाशित

(संशोधित)

Views: 1081

Comment

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Comment by वीनस केसरी on January 20, 2014 at 3:50am

कैसे - कैसे लोग मिलते हैं यहाँ देखो सही

बात में चीनी घुली थी दिल मगर काला भी था

 

वो अज़ब ही दौर था हर बात पर हँसते थे हम

ये जहाँ  गोया लतीफ़ा मस्त बचकाना भी था


वाह भाई छा गए ,,, बेहद शानदार


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 14, 2014 at 11:05pm

बहुत खूब ! प्रयासरत रहें

शुभेच्छाएँ

Comment by ram shiromani pathak on January 14, 2014 at 9:33pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल आदरणीय भाई अमित कुमार जी। । हार्दिक बधाई आपको 

Comment by Ajay Agyat on January 11, 2014 at 7:19pm

उम्दा

Comment by Jaimangal Singh,Ek Aur Shayar on January 11, 2014 at 6:06pm
Simple and touching to heart..
Comment by अमित वागर्थ on January 10, 2014 at 8:26pm

आदरणीय योगराज सर पुनः आपका हार्दिक अभिनन्दन,एवं आ० मीना जी ,आ० नादिर जी , विजय जी ,अन्नपूर्णा जी आप सभी का रचना अनुमोदन हेतु हार्दिक आभार.आगे भी स्नेह बनाये रखें. सादर    

Comment by annapurna bajpai on January 9, 2014 at 7:19pm

सुंदर गजल बहुत बधाई आपको । 

Comment by विजय मिश्र on January 9, 2014 at 6:04pm
अमितजी , बेहद नाजुक लफ्जों को बहुत बारीकी से बिठाया है उनकी जगह . बेहतरीन कशीदाकारी कियी है गजल की |दमदार है ,बधाई |

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 9, 2014 at 4:36pm

संशोधनों के बाद ग़ज़ल और भी निखर गई है भाई अमित कुमार जी, हार्दिक बधाई प्रेषित है.

Comment by नादिर ख़ान on January 9, 2014 at 4:28pm

अदरणीय अमित जी शायद पहली बार मैंने आपकी रचना को  पढ़ा और मंतमुग्ध सा हो गया, यही वजह रही की आपकी पुरानी पोस्ट को भी पढ़ने की जिज्ञासा हुयी बहुत खूब लिखते है आप ...

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